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अमृतसर. बजर्र पेंट्स के चेयरमैन कुलदीप सिंह ढींगरा इस समय 50 सबसे अमीर भारतीयों में शामिल हैं। दुनिया के सबसे अमीरों की फोर्ब्स की लिस्ट में भी उनका नाम है। कुलदीप और उनके ढींगरा परिवार की कहानी अमृतसर से ही शुरू हुई थी, जहां उनके पड़दादा भाई उत्तम सिंह ने 1898 में हाल बाजार में पेंट की दुकान खोली थी। आज उनके पड़पोते कुलदीप सिंह ढींगरा की कंपनी देश की दूसरी सबसे बड़ी पेंट कंपनी है। यह सालाना 5100 करोड़ से ज्यादा का कारोबार करती है।
भाई उत्तम सिंह बगीचों के मालिक होने के साथ वह फलों के थोक व्यापारी भी थे। कुलदीप के दादा केसर सिंह बड़े हुए तो पड़दादा ने व्यापार फैलाने की सोची। फलों का कारोबार चलता रहा, बेटे के साथ उन्होंने एकदम हटकर नए बिजनैस में हाथ डालकर पेंट की दुकान खोल डाली। इसका नाम दिया बी. उत्तम सिंह-केसर सिंह। यह दरबार साहिब के गेट के पास दर्शनी ड्योढ़ी के सामने थी। उस वक्त तक भारतीय उपमहाद्वीप में पेंट नहीं बनता था। सारा पेंट यू.के. से आता था। भारत की पहली पेंट फैक्टरी शालीमार पेंट्स है, जो 1903 में कलकत्ता में शुरू हुई थी। आज बजर्र पेंट्स इससे बहुत आगे निकल चुका है। 

कुलदीप ढींगरा के दादा भाई केसर सिंह का रंगवाला बिजनैस धड़ाधड़ चला। अमृतसर में वह रंगवाला परिवार के नाम से मशहूर हो गए। 1928 में उन्होंने पेंट की दूसरी दुकान केसर सिंह एंड संस के नाम से हाल बाजार में खोली। केसर सिंह बिजनैस बुद्धि वाले थे। उन्होंने तब अपने स्टॉकिस्टों को वर्किग पार्टनर बनाकर मुनाफे में हिस्सेदारी देनी शुरू की। इसलिए जितनी बिक्री, उतना ही मुनाफा। उन्होंने बिजनैस का रोजमर्रा का काम प्रोफैशनल के कंधों पर डाल दिया था। वह खुद और बेटे भी दुकानों पर रोजाना आते थे, लेकिन सिर्फ देखरेख करने। बेटे भी काम और प्राइवेट लाइफ के बीच बैलेंस बनाते थे। शाम को क्लब में जाकर गोल्फ, टैनिस और स्क्वाश खेलना उनका नियम ही था। बेटे छह थे। वे बड़े हुए तो बिजनैस की जिम्मेदारियां भी बांट दीं। तीन सबसे बड़े बेटों हरभजन, हरचरण और करतार को कराची भेज दिया। चौथे बेटे निरंजन सिंह अमृतसर की दुकान और लाहौर का काम देखते रहे। दो सबसे छोटे चतर सिंह और दलीप सिंह दिल्ली भेजे गए।
अमृतसर से नाता कुलदीप ढींगरा के पिता निरंजन सिंह का लगातार बना रहा। 1947 में बंटवारा हुआ तो कराची से हरभजन सिंह इंग्लैंड चले गए और बाकी दो भाइयों ने मुंबई का जहाज पकड़ा। इन्होंने वहां पेंट ब्रश बनाने की फैक्टरी भी लगा ली। पिता ने निरंजन सिंह को अमृतसर के दुकानों के साथ दिल्ली में अपने दोनों छोटे भाइयों की जिम्मेदारी और उनके बिजनैस में हिस्सेदारी भी दी थी। 
पिता निरंजन सिंह जुनूनी किस्म के बिजनैसमैन थे। सिर्फ 19 साल में बिजनैस ट्रिप पर जापान भी जा चुके थे। आजादी के बाद वह तेजी से तरक्की करना चाहते थे। तब वह सिर्फ 27 साल के थे और वह दो बेटों सोहन सिंह और इस कहानी के मुख्य पात्र कुलदीप सिंह के पिता बन चुके थे। वह पत्नी सुरजीत कौर और दोनों बेटों के साथ दिल्ली में बस गए। बाद में गुरबचन सिंह और आशी के पिता भी बने। 
निरंजन सिंह ने 1953 में पॉश गोल्फ लिंक्स में बंगला बना लिया। पड़ोस के दूसरे बंगले में दोनों छोटे भाई रहते थे तो तीसरा बंगला इंग्लैंड गए सबसे बड़े भाई हरभजन सिंह का था। नजफगढ़ रोड में उन्होंने पेंट बनाने की फैक्टरी भी लगा ली। पुश्तैनी बिजनैस परिवारों पर लिखी गई सोनू भसीन की किताब द इनहैरिटर्स के अनुसार केसर सिंह ने दिल्ली में तीनों छोटे बेटों में मतभेद शुरू होते देखकर बिजनैस पूरा बांट दिया। अमृतसर की 1898 की पुश्तैनी दुकान और नजफगढ़ की फैक्टरी निरंजन सिंह को मिली। अमृतसर की दूसरी दुकान और दिल्ली की दुकानें और अन्य बिजनैस बाकी दोनों छोटे बेटों को मिला।

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Web Title: The story of Kulrajp Dhingra, chairman of Bajrang Paints, which started from the recent market

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