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नई दिल्लीः  केंद्र में सत्ता के लिए अहम उत्तर प्रदेश में हाशिये पर पहुंच चुकी कांग्रेस ने नेहरु गांधी परिवार के एक और सदस्य प्रियंका गांधी वाड्रा के रुप में तुरुप का इक्का चल दिया है जिससे प्रदेश के राजनीतिक माहौल में निश्चित रुप से बड़ा बदलाव आयेगा लेकिन पार्टी को इससे कितना फायदा मिलता है, इसका पता आने वाले आम चुनाव के बाद ही लग सकेगा।

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कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने गुरुवार को प्रियंका को पार्टी महासचिव नियुक्त कर उत्तर प्रदेश के पूर्वी हिस्से का प्रभारी बनाया है। वह फरवरी के पहले सप्ताह में अपना कार्यभार संभालेंगी। कांग्रेस अध्यक्ष ने यह फैसला ऐसे समय लिया है जब प्रदेश में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने अप्रैल-मई में होने वाले लोकसभा चुनाव साथ लड़ने का निर्णय लिया है। दोनों दलों ने कांग्रेस को अकेला छोड़ दिया है जबकि कांग्रेस सहित अधिकतर विपक्षी दल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी भारतीय जनता पार्टी को हराने के लिये महागठबंधन की बात कर रहे हैं।

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राजनीतिक प्रेक्षकों का कहना है कि प्रियंका गांधी को सक्रिय भूमिका देने की लंबे समय से मांग कर रहे कांग्रेस कार्यकर्ताओं में राहुल गांधी के इस फैसले से निश्चित रुप से उत्साह और जोश बढ़ेगा और उनकी सक्रियता बढ़ेगी लेकिन पार्टी से छिटक गये मतदाताओं को अपने साथ जोड़ने के लिये उन्हें और पार्टी को कड़ी मशक्कत करनी होगी।

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उन्हें पूरे उत्तर प्रदेश का भार सौंपने की बजाय सिर्फ पूवीं उत्तर प्रदेश का प्रभार सौंपा गया है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश का प्रभार सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया को दिया गया है। पूर्वी उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का प्रदर्शन काफी कमजोर रहा है और नरेंद्र मोदी तथा उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ का चुनाव क्षेत्र इसी हिस्से में हैं। इस तरह प्रियंका गांधी को उन दोनों की चुनौतियों के साथ साथ सपा बसपा का सामना भी करना होगा। कांग्रेस ने राज्य में पिछला विधानसभा चुनाव समाजवादी पार्टी के साथ मिलकर लड़ा था लेकिन इस गठबंधन को भारी पराजय का सामना करना पड़ा था।

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लोकसभा चुनावों में कांग्रेस के प्रदर्शन की बात की जाये तो 1984 के बाद से उसका ग्राफ लगातार नीचे गिरता रहा है। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद 1984 में हुए आम चुनाव में कांग्रेस ने राज्य की 85 में से 83 सीटें जीती थीं तथा उसे 51 प्रतिशत से अधिक मत मिले थे। उसके बाद से उसकी स्थिति लगातार खराब होती रही है। न केवल उसकी सीटें घटती गयी बल्कि उसे मिलने वाले मतों में भी भारी गिरावट आयी। पांच चुनावों में तो उसकी सीटों की संख्या दो अंकों तक में नहीं पहुंच सकी। पार्टी 1998 के आम चुनाव में राज्य में एक भी सीट नहीं जीत पायी थी।

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पिछले लोकसभा चुनाव में सोनिया गांधी और राहुल गांधी अपनी सीटें बचा पाने में सफल हुये थे। पिछले तीन दशक में पार्टी को सबसे अधिक 21 सीटें 2009 के लोकसभा चुनाव में मिली थीं जब कांग्रेस केंद्र में लगातार दूसरीी बार गठबंधन सरकार बनाने में सफल रही। प्रियंका को भले ही पहली बार पार्टी में कोई पद मिला है लेकिन वह अपनी मां तथा कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी के संसदीय क्षेत्र रायबरेली और अपने भाई राहुल गांधी के चुनाव क्षेत्र अमेठी में चुनाव प्रचार में सक्रिय भूमिका निभाती रही हैं। वह राज्य के पार्टी नेताओं तथा कार्यकर्ताओं के लगातार संपर्क में रहती हैं।

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Web Title: Uttar Pradesh warmed by Priyanka entry in politics

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