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 एेसा नहीं है कि महानगरों में आजकल हिंदी नहीं बोली जा रही। सच्चाई तो यह है कि उत्तर भारत के बड़े शहरों में ही नहीं बल्कि मुंबई, हैदराबाद, पुणे और बंग्लुरु में भी बहुसंख्यक लोग इन दिनों हिंदी में ही बात करते हैं। मगर जरा इनमें से किसी भी शहर में आप जरा किसी से 5 मिनट तक धाराप्रवाह ऐसी हिंदी बोलकर देखिए, जिसमें हर शब्द हिंदी का हो। तुरंत आपको टोक दिया जाएगा, ‘कठिन हिंदी मत बोलो’, ‘ये पंडिताऊ हिंदी अपने पास रखो’। हिंदी पर वास्तव में यही सबसे बड़ा खतरा है। लेकिन इसे हम या तो जानते नहीं या इससे अंजान होने की कोशिश करते हैं। यही वजह है कि तमाम उदार किस्म के लोग भी बड़ी सहजता से यह कहते मिल जाते हैं कि हिंदी तभी फले-फूलेगी, जब उसमें सहजता से अंग्रेजी भाषा के ज्यादा से ज्यादा शब्द इस्तेमाल होंगे या वे तमाम शब्द जो बोलचाल के दौरान नई पीढ़ी इस्तेमाल करती है। पता नहीं ये सुझाव या उपदेश नासमझी में दिए जाते हैं या इनके पीछे कोई सोची-समझी साजिश होती है, मगर हकीकत यही है कि भाषाएं एक दिन में नहीं मरतीं और न ही एक झटके में मरती हैं।

किसी भी भाषा के मरने का या उसे कमजोर करने का यही तरीका होता है कि धीरे-धीरे उसमें दूसरी भाषा के शब्द इस्तेमाल करना शुरू कर दिए जाएं और इस हद तक उन्हें ले जाया जाए कि मूल भाषा के बचे-खुचे शब्दों से बनाए गए वाक्य का तब तक कोई अर्थ ही न निकले, जब तक इस्तेमाल किये गए दूसरी भाषा के शब्दों के अर्थ, एहसास और मनोविज्ञान की आपको समझ न हो। हिंदी के साथ यही हो रहा है। जो लोग प्रगतिशीलता के नाम पर हिंदी में तमाम भाषाओं के शब्दों के अधिकाधिक उपयोग को बढ़ावा देने की वकालत करते हैं, वे लोग नहीं समझते कि शब्द महज किसी वाक्य को बनाने के लिए निर्जीव अक्षर मात्र नहीं हैं। किसी भी वाक्य में इस्तेमाल सभी शब्दों के अर्थों का एकसाथ मिलकर जब कोई प्रभावशाली अर्थ निकलता है, तभी वह वाक्य जोरदार बनता है और तभी वह भाषा प्रभावशाली दिखती है। फ्रूट चाट चाहे कितना अच्छा हो, लेकिन फ्रूट चाट को हम किसी एक फल की चाट नहीं कह सकते। यही बात किसी भाषा के लिए भी सही होती है, जब उसमें एक हद से ज्यादा शब्दों की मिलावट हो जाए। 

दरअसल हर शब्द का अपना एक एहसास होता है और यह एहसास उसकी उस पृष्ठभूमि से आता है, जहां वह शब्द रचा जाता है यानी उसका विकास होता है। जब हम हिंदी में अंग्रेजी के तमाम शब्दों की गैर-जरूरी चाट बनाने की कोशिश करते हैं तो उससे बने पूरे वाक्य का कोई प्रभावशाली अर्थ नहीं निकलता, भले उस वाक्य का मतलब समझ में आ जाए। लेकिन जब एक वाक्य में दो-तीन शब्द किसी और भाषा के शामिल हो जाते हैं तो वह वाक्य उस भाषा के संदर्भ में कमजोर और प्रभावहीन हो जाता है। क्योंकि तब पूरे वाक्य का अर्थ दूसरी भाषा के शब्दों के अनुवाद को जोड़कर ही बनता है जो महज एक मशीनी, तकनीकी और नीरस वाक्य होता है। इस पूरे संदर्भ में हिंदी के लिए सबसे बड़ा खतरा हिंदी में अंग्रेजी की गबड़-घुसेड़ है, जिसे हम हिंग्लिश कहते हैं। 


नयी पीढ़ी हो सकता है मजबूरी के चलते अपने हिंदी के वाक्यों को अंग्रेजी के शब्दों की बैसाखी से बनाना पड़ता हो, लेकिन चूंकि अंग्रेजी माध्यम से पढ़कर आने वाले लोग व्यवहारिक जीवन और करियर के संबंध में खूब प्रभावशाली सफल और प्रतिष्ठित होते हैं। इसलिए जो लोग धाराप्रवाह शुद्ध हिंदी बोल लेते हैं या बोल सकते हैं, ऐसे लोग भी जब किसी बड़े आदमी से बात कर रहे होते हैं तो जानबूझकर अपनी हिंदी में अंग्रेजी के शब्दों की बैसाखी लगाने की कोशिश करते हैं; क्योंकि उनके दिलो-दिमाग में कहीं न कहीं हीनभावना जड़ जमाए बैठी होती है कि अगर पूरी तरह से धाराप्रवाह हिंदी में बात करेंगे तो कहीं देहाती या पिछड़ा हुआ न समझ लिया जाए। कुछ लोग जो खुद को हिंदी का हितैषी बताते नहीं थकते, वह भी बड़ी सहजता से ऐसे लोगों को शुद्धता के आग्रह से पीड़ित बताने में देर नहीं लगाते, जिनकी कोशिश होती है कि कोई भी बात पूरी तरह से या जहां तक संभव हो सके हिंदी में लिखी या व्यक्त की जाए। हालांकि भाषा में शुद्धता-अशुद्धता जैसी कोई चीज ही नहीं सहोती और अगर होती है तो शुद्धता जब किसी दूसरे संदर्भ या क्षेत्र में हानिकारक नहीं होती तो भला भाषा के संदर्भ में शुद्ध भाषा कैसे नकारात्मक हो सकती है? क्या शुद्ध खाना स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक हो सकता है? क्या शुद्ध पानी पेट खराब कर सकता है? क्या शुद्ध संगीत किसी को तनावग्रस्त कर सकता है? अगर ऐसा नहीं है तो फिर शुद्ध भाषा कैसे नुक्सानदायक हो सकती है?

सवाल है फिर लोग क्यों शुद्धता के नाम पर उन लोगों को उलहाना देते नहीं थकते जो पूरी तरह हिंदी में अभिव्यक्ति के हिमायती होते हैं। जो अपनी बात पूरी तरह से हिंदी के शब्दों में कहना चाहते हैं। दरअसल इन उलहाना देने वाले लोगों में अपनी भाषा को लेकर ही नहीं बल्कि अपने वजूद को लेकर भी एक हीनग्रंथि होती है। अपनी इसी हीनग्रंथि के चलते ये न केवल भाषा में गैर-जरूरी मिलावट करने के हिमायतीहोते हैं बल्कि जिन लोगों की शुद्ध शब्दों में अभिव्यक्ति के लिए तारीफ की जानी चाहिए, उनका मखौल उड़ाने की कोशिश करते हैं। अफसोस की बात यह है कि हिंदी को इस संकट के घेरे में लाने के लिए सबसे ज्यादा पत्रकार और पत्रकारिता दोषी है। पता नहीं, पत्रकारों में यह कौन सी हीनभावना है जो कि वे जब भी कुछ लिखते हैं तो न केवल उसमें व्यवहारिकता के नाम पर ज्यादा से ज्यादा अंग्रेजी शब्दों को ठूंसने की कोशिश करते हैं बल्कि इसे नियम बनाने के हठ से भी बाज नहीं आते। कई हिंदी के अखबारों ने तो बड़ी बेशर्मी से वर्तनी के साथ ही

अंग्रेजी के शब्द लिखना शुरु कर दिया है। हैरानी की बात यह है कि इसे वह अपनी प्रगतिशीलता मानते हैं। वास्तव में दुनिया में कोई भी ऐसी भाषा नहीं है जिसके जरिये किसी भी संदर्भ में 100 फीसदी अभिव्यक्त की जा सके। दुनिया की हर भाषा को अभिव्यक्ति की पूर्णता के लिए अलग-अलग समय में अलग-अलग भाषा के शब्दों का इस्तेमाल करना ही पड़ता है। इसकी वजह यह है कि कोई भी भाषा पूरी तरह से पूरी दुनिया के हर कोने में नहीं बोली जाती और बोली भी जाती है तो एक ही भाषा अलग अलग भौगोलिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक खंडों में अलग अर्थ और अलग एहसास हासिल करती हैं। इसलिए एक ही एहसास के लिए एक ही भाषा के अलग अलग भौगोलिक भूखंडों में अलग अलग शब्द होते हैं और कई बार शब्द एक ही हों तो भी उनके अर्थ और एहसास भिन्न भिन्न होते हैं। लब्बोलुआब यह कि हर भाषा को कुछ न कुछ शब्द दूसरी भाषा के लेने की पड़ते हैं ताकि अपनी बात को सम्पूर्णता और प्रभावशाली तरीके से कहा जा सके। जब पारिभाषिक शब्द ज्यादातर परायी भाषा से आने लगते हैं तो वह भाषा कमजोर हो जाती है।
 

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Web Title: Threat of Hinglish on Hindi

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