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जालंधर : आटोमेटिड ड्राइविंग ट्रैक पर स्टाफ तहजीब भूल रहा है। सीनियर सिटीजन्स व महिलाओं को भी लाइनों में धक्के खाने को मजबूर होना पड़ रहा है, जबकि अधिकारी ट्रैक से नदारद रहते हैं। अधिकारियों का खौफ नहीं होने के कारण स्टाफ भी अब बेखौफ हो चुका है और एजैंटों को तरजीह दी जा रही है, जबकि काऊंटर के बाहर लंबी-लंबी लाइनों में लोग परेशान हो रहे हैं। लंबी लाइनें, ऊपर से गर्मी व उमस, घंटों लाइनों में खड़े रहने के कारण लोग बेहोश भी होने लगे हैं, मगर स्टाफ पर जैसे इसका कोई असर नहीं हो रहा है। घंटों लाइन में खड़े रहकर बुजुर्ग भी हांफ रहे हैं। 
सबसे ज्यादा असर ड्राइविंग लाइसैंस के डिलीवरी काऊंटर पर है। भीड़ इतनी ज्यादा हो जाती है कि वहां एक ही जगह पर लाइन घुमाव में लगाई जा रही है। पंखें हैं कि काम नहीं कर रहे हैं, ऊपर से ए.सी. के बैक की हीट शैड के नीचे खड़ा होना दूभर कर रही है। शुक्रवार को एक महिला ट्रैक पर बेहोश हो गई थी। हालात ये हैं कि लाखों रुपए खर्च कर ट्रैक का निर्माण लोगों की सहूलियत को देखकर किया गया था, मगर आज हालात इसके उलट हैं। लोग परेशान हैं, उनके बैठने तक का कोई इंतजाम नहीं है। लोग लाइनों में खड़े-खड़े जब थक जाते हैं तो वहीं बैठकर थकान मिटाने की कोशिश करते हैं। बुजुर्गो तथा महिलाओं के लिए तो ड्राइविंग लाइसैंस की डिलीवरी किसी पहाड़ पर चढ़ने जैसी स्थिति है। एक मुलाजिम ऊपर से ‘नीम चढ़ा’, जनता परेशानी के आलम में है, मगर इसकी न तो अधिकारियों को परवाह है और न ही स्टाफ को। स्मार्ट चिप कंपनी के इंचार्ज साहब भी निजी कामों में व्यस्त रहते हैं, जबकि असिस्टैंट सै. आर.टी.ए. ट्रैक का जिम्मा तो संभाले हैं, मगर 12 बजे तक ही काम निपटा कर डी.सी. ऑफिस की तरफ कूच कर जाते हैं। ऐसे में आफ्टर लंच पूरा ट्रैक या तो स्टाफ के हाथ होता है या एजैंटों के। जनता तो बेचारी कभी एक काऊंटर तो कभी दूसरे काऊंटर पर धक्के खाने को मजबूर हो रही है। ड्राइविंग लाइसैंस की डिलीवरी फिलहाल फरवरी-मार्च तक की पैंडिंग चल रही है। एक दिन में 250 से 300 ड्राइविंग लाइसैंस आवेदन होते हैं, इस लिहाज से माह में 20 दिन काम होता है, एक माह में 6000 तक लाइसैंस बन रहे हैं। ऐसे में 18000 से ज्यादा लाइसैंसों की पैंडैंसी चल रही है।

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Web Title: thousands of forgotten staff elderly people women also have to eat

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