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ब्रजमोहन सिंह 

राजनीतिक पंडितों का मानना है कि भारत में तीसरे मोर्चे के लिए सही वक्त आ गया है। एक तरफ जहां कांग्रेस सिकुड़ रही है वहीं भारतीय जनता पार्टी का तमाम विरोधों के बाद भी लगातार विस्तार हुआ है। अभी हालत यह है कि कांग्रेस पार्टी की महज 3 राज्यों में सरकार है जबकि BJP देश के 70 फ़ीसदी हिस्से पर काबिज़ हो चुका। कांग्रेस पार्टी के पास यही विकल्प है कि एक महागठबंधन का निर्माण किया जाए ताकि बीजेपी को दिल्ली की गद्दी से दूर रखा जा सके। लेकिन क्या यह इतना आसान है? 

ग्रेस पार्टी साथियों की तलाश में है, राहुल गांधी की कोशिश है कि क्षेत्रीय पार्टियों का एक विशाल महागठबंधन बनाया जाए।लेकिन इतिहास के पन्ने पलट कर देखें तो तीसरे मोर्चे की बार-बार दुर्गति कुछ और कहानी बयां करती है। आज विपक्षी पार्टियों के नेता एक-दूसरे के लिए प्यार जतला रहे हैं। दूसरी तरफ नरेंद्र मोदी हैं जिन को केंद्र में रखकर विपक्षी पार्टियां एकता की बात कर रही हैं लेकिन अगर राजनीतिक एजेंडा की बात करें तो अब विपक्षी पार्टियों का कोई सामूहिक एजेंडा सामने नहीं आया है।  

पहले नेशनल फ्रंट और यूनाइटेड फ्रंट गवर्मेंट को लेकर जो प्रयोग हुए वह निश्चित तौर पर दुखद रहे और ये वैकल्पिक व्यवस्था देने में सफल नहीं हुए। विपक्षी पार्टियों के लोग पावर शेयरिंग के लिए कोई कॉमन फार्मूला नहीं बना पाए हैं। 2019 लोकसभा चुनाव से पहले तीसरी पार्टियों के ज़रूरी है कि सबसे पहले एक कॉमन ग्राउंड बनाएं। BJP सत्ता विस्तार के लिए के अलग अलग मंसूबे अपनाती है, जिससे विपक्षी दलों में भय का माहौल पैदा हुआ है।  

यह बात भी सही है कि बीजेपी नेताओं के बार बार कांग्रेस मुक्त भारत के नारे से असुरक्षा का माहौल बढ़ा है। ना सिर्फ विपक्षी पार्टियों में बल्कि जो एनडीए के समर्थक दल हैं उनके अंदर भी असुरक्षा का माहौल पैदा हुआ है और वह हर हाल में ज्यादा से ज्यादा पावर शेयरिंग में अपनी हिस्सेदारी देखना चाहते है। लेकिन यह बात भी ध्यान में रखनी चाहिए कि तीसरे मोर्चे के पास अगर कोई एजेंडा नहीं है तो सिर्फ मोदी विरोध को लेकर एक वैकल्पिक राजनीतिक व्यवस्था खड़ी नहीं की जा सकती है। जनता सिर्फ विरोध नहीं अजेंडा देखना चाहती है। लोकतंत्र मजबूत हो चुका है।

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Web Title: the opposition is not the only person to tell what his agenda is in front of modi


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