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 ब्रज मोहन सिंह

भारत में लोकसभा चुनाव से पहले सियासत पूरी तरह से पक चुकी है। यहाँ हर राजनीतिक दल के लिए मौका है कि वह अपनी नीतियों को लेकर जनता के बीच जाए, लेकिन सत्ता से बाहर हुई कांग्रेस इस बार कुछ ज्यादा ही बेचैन है। येन-केन-प्रकारेण सत्ता हथियाने के लिए, वह हर संभव हथकंडे अपना रही है। इसकी शुरुआत तो दो साल पहले ही हो चुकी थी जब इसने अपनी ही सेना से सर्जिकल स्ट्राइक के सबूत मांगे। राष्ट्रीय हित के मुद्दे पर कांग्रेस का इस तरह का व्यवहार वाकई चिंताजनक है। कम से कम अमेरिका, फ्रांस और ब्रिटेन जैसे विकसित देशों में ऐसा नहीं होता, विपक्ष राष्ट्रहित के मुद्दे पर कंधे से कन्धा मिलाकर सरकार के साथ खड़ा रहता है।

पिछले दिनों जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा कि कांग्रेस उसे हराने के लिए अंतर्राष्ट्रीय गठबंधन कर रही है तो इसके मायने साफ़ थे कि बॉर्डर पार से कांग्रेस को लगातार सहानुभूति मिल रही थी। यह कोई अब शुरू हुआ हो, ऐसा कतई नहीं है। नरेन्द्र मोदी जब पहली बार 2014 में देश के प्रधानमंत्री बने, कांग्रेस के कुछ नेता मोदी को पकिस्तान विरोधी नेता के तौर पर लगातार प्रोजेक्ट करने में लगे हुए थे।
 
कांग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर की, जिनकी कांग्रेस में दोबारा वापसी हुई, ने कहा था कि भारत और पाकिस्तान में सम्बन्ध बहाली के लिए ज़रूरी है कि मोदी को सत्ता से बाहर किया जाए। इस तरह के विचार एक नहीं कई नेताओं के हैं, जो लगातार बीजेपी की हार के लिए बाहर की शक्तियों से हाथ मिलाने को तत्पर हैं।

जब भारत और चीन के बीच डोकलाम को लेकर विवाद चरम पर था, कांग्रेस के अध्यक्ष चीनी नेताओं से गुपचुप बातचीत कर रहे थे, यह अब कोई ढंकी छुपी बात नहीं रह गई है। भारतीय सैन्य जवानों की बर्बरता पूर्वक हत्या के बाद भारत ने पाकिस्तान के विदेश मंत्री के साथ अपनी बातचीत रद्द कर दी। दोनों देशों के बीच कई स्तर पर आरोपों का सिलसिला शुरु हो गया, लेकिन कांग्रेस के स्वर पाकिस्तान के स्वर से मिल रहे थे। इस बीच पाकिस्तान के पूर्व मंत्री रहे रहमान मलिक ने आग में घी डालने का काम किया। उन्होंने खुलेआम कांग्रेस को जिताने की गुहार लगाई। क्या राहुल गाँधी चुनाव लड़ने के लिए अंतर्राष्ट्रीय साझीदार खोज रहे हैं?  

पाकिस्तान को इस बात की चिंता है कि भारत चुनाव पूर्व “सर्जिकल स्ट्राइक' को बड़ा मुद्दा बना सकता है। खबर यह भी है कि भारत सरकार चुनाव के मद्देनजर सर्जिकल स्ट्राइक डे मना सकती है, जिससे पाकिस्तान की अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर फजीहत होगी।पाकिस्तान ने अपनी तरफ से कहा है कि दोनों देशों के बीच युद्ध कोई समाधान नहीं है और दोनों देशों को चाहिए कि आपस में मिल बैठकर बात करें और आपसी मुद्दों को सुलझाएं लेकिन यह सिर्फ बातों से नहीं होगा।

भारत में नरेन्द्र मोदी के सत्ता में आने के बाद आतंकवादियों से निपटने के लिए सरकार ने बहुत ही सख्त रवैया अपनाया, जिसके बाद घाटी में आतंकी बैकफूट पर आये, लेकिन पाकिस्तान ने कश्मीर पर अपना रुख बरकरार रखा। पिछले दिनों कांग्रेसी मंत्री नवजोत सिंह सिद्धू ने करतारपुर कॉरिडोर खोलने का एक बड़ा शिगूफा चलाया, लेकिन पाकिस्तान की नीयत साफ़ होती तभी बात आगे बढ़ती। आने वाले दिनों में पाकिस्तान चाहे-अनचाहे सुर्ख़ियों में बना रहा है। कभी कांग्रेस के बहाने तो कभी कश्मीर के बहाने।

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Web Title: Pakistan entry into the Indian elections is it a matter of pride

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