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 अभिरंजन कुमार

जदयू के नेता कह रहे हैं कि नीतीश कुमार बिहार में एनडीए के फेस हैं। सच है कि वे फेस तो हैं, लेकिन बेस खो चुके हैं। अपनी गलत चालों के कारण वे बिहार में लगातार कमज़ोर हुए हैं। 2013 से लेकर अब तक उनकी विश्वसनीयता भी क्रमशः कम हुई है और उनका जनाधार भी घटा है। दूसरी तरफ, भारतीय जनता पार्टी भी अब 2014 जैसी लहर पर सवार नहीं है। 

नीतीश कुमार को यह भली-भांति समझ लेना होगा कि जब वह एनडीए से टूटकर कांग्रेस-राजद के महागठबंधन में आए थे, तब उन्हें जितना भाव मिला, अब अगर वे दोबारा उस महागठबंधन का हिस्सा बनने का प्रयास करेंगे, तो उतना भाव उन्हें नहीं मिलेगा, क्योंकि 2015 से लेकर अब तक बिहार में लगातार यह स्थापित हुआ है कि नीतीश कुमार का जनाधार राजद की तुलना में क्षीण होता गया है और इसलिए इस बार उन्हें राजद के भारी दबाव में रहना होगा और तेजस्वी भी मन से उन्हें अपना नेता नहीं मानेंगे, बल्कि बीच-बीच में अपनी तेज़ी उन्हें दिखाते रहेंगे।

वहीं भाजपा को भी यह समझ लेना चाहिए कि 2014 में उसका सामना बिखरे हुए विपक्ष से हुआ था, जबकि इस बार उसके सामने एक गठबंधन होगा, जो 2015 के विधानसभा चुनावों जितना मज़बूत भले न हो, पर यह बहुत कमज़ोर भी नहीं है। इसमें राजद पहले से अधिक ताकतवर हुआ है और कांग्रेस की शक्ति यथावत है। जीतनराम मांझी जैसे दलित नेता अपने कम जनाधार के बावजूद उनके साथ कुछ न कुछ जोड़ेंगे ही। फिर रामविलास पासवान (लोजपा) और उपेंद्र कुशवाहा (रालोसपा) भी अभी तेल देखेंगे और तेल की धार देखेंगे, और मुमकिन है कि इनमें से कोई एक या दोनों आम चुनाव से पहले विरोधी खेमे में शामिल हो जाए। ऊपर से भाजपा के पक्ष में 2014 जैसी लहर भी नहीं चलेगी। कट्टर समर्थक तो उसके साथ बने रहेंगे, लेकिन वादों पर भरोसा करके उससे जुड़े वोटर डगमगा सकते हैं।

इसलिए, बेहतर तो यही होगा कि दोनों ही अपने मन की चंचलता पर काबू करें और एक अच्छे पति-पत्नी की तरह एक-दूसरे का साथ निभाएं।जदयू और भाजपा दोनों ही पार्टियों को मेरी बिन मांगी सलाह यह है कि वे एक-दूसरे की कमर पकड़कर उन्हें सहारा दें और इधर-उधर की बयानबाज़ी छोड़कर एक-दूसरे के लिए यह रोमांटिक गाना गाएं-

"ऊंची-नीची है डगरिया।
पतली है मोरी कमरिया।
बलम धीरे चलो रे।
बलम धीरे चलो जी..."

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Web Title: nitish kumar and narendra modi allance


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