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जम्मू: श्री गुरु गोबिंद सिंह के 352वें प्रकाशोत्सव के मौके पर डिगियाना आश्रम गुरुद्वारा साहिब में एक विशाल समागम का आयोजन किया गया, जिसमें उनकी शिक्षाओं पर वक्ताओं ने प्रकाश डाला। इस मौके पर रागी जत्थों ने भी गुरु की शिक्षाओं का प्रचार किया और संगत ने गुरु घर में शीश निवाकर आशीष लिया। मौके पर महंत मनजीत सिंह, चेयरमैन डी.जी.पी.सी. टी.एस.वजीर, पूर्व डी.जी.पी.सी. अध्यक्ष सुदर्शन सिंह वजीर और पूर्व मंत्री रमन भल्ला समारोह में विशेष रूप से मौजूद थे। मौके पर वक्ताओं ने कहा कि गुरु गोबिंद सिंह मूलत: धर्मगुरु थे। 

अस्त्रशस्त्र या युद्ध से उनका कोई वास्ता नहीं था, लेकिन औरंगजेब को लिखे गए अपने जफरनामा में उन्होंने इसे स्पष्ट किया था ‘चूंकार अज हमा हीलते दर गुजशत, हलाले अस्त बुरदन ब समशीर ऐ दस्त।’ यानि जब सत्य और न्याय की रक्षा के लिए अन्य सभी साधन विफल हो जाएं तो तलवार को धारण करना सर्वथा उचित है। धर्म, संस्कृति व राष्ट्र की शान के लिए गुरु गोबिंद सिंह ने अपना सब कुछ न्यौछावर कर दिया। इस जफरनामा (विजय की चिट्ठी) में उन्होंने औरंगजेब को चेतावनी दी कि तेरा साम्राज्य नष्ट करने के लिए खालसा पंथ तैयार हो गया है। गुरु गोबिंद सिंह जी ने कहा है कि ‘जबजब होत अरिस्ट अपारा, तब-तब देह धरत अवतारा।’ 

उनके कहने का भाव था कि जब-जब धर्म का ह्रास होकर अत्याचार, अन्याय, हिंसा और आतंक के कारण मानवता खतरे में होती है तब-तब भगवान दुष्टों का नाश और धर्म की रक्षा करने के लिए इस भूतल पर अवतरित होते हैं। सिखों के दसवें गुरु गोबिंद सिंह जी स्वयं एक ऐसे ही महापुरु ष थे, जो उस युग की बर्बर शक्तियों का नाश करने के लिए अवतरित हुए। वे क्रांतिकारी युगपुरुष थे। वे धर्म-प्रवर्तक और एक शूरवीर राष्ट्र नायक थे। वे सत्य, न्याय, सदाचार, निर्भीकता, दृढ़ता, त्याग एवं साहस की प्रतिमूर्ति थे। इसलिए हमें उनके मार्ग का अनुसरण करते हुए अन्याय के खिलाफ खड़े होना है और समाज में शांति व आपसी भाईचारे को मजबूत करना है। 

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Web Title: Ragi batches connected consistent to guru phages

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