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नई दिल्ली : जी.पी.एस. के इस जमाने में घर से बाहर निकलते ही लोग अपनी मंजिल का पता ढूंढने लगते हैं, लेकिन आज भी बहुत से लोग ऐसे हैं जो सफर में सड़क किनारे लगे मील के पत्थरों को देखकर इस बात का अंदाजा लगाते हैं कि वह किस रास्ते पर हैं और उनकी मंजिल अभी कितनी दूर हैं। अब अगर आप किसी सफर पर निकलें तो सड़क किनारे खड़े इन पत्थरों को अनदेखा न करें क्योंकि रास्ता बताने वाले आधुनिक साधन पता नहीं कब आपका साथ छोड़ दें, लेकिन सदियों से आपको मंजिल का पता देने वाले ये खामोश मील के पत्थर आज भी आपको बताएंगे कि ‘मंजिल’ अब दूर नहीं है। सड़क चाहे छोटी हो या बड़ी, उसके किनारे पर एक निश्चित दूरी पर अलग-अलग रंग के मील के पत्थर लगे दिखाई देते हैं, जिन पर आगे आने वाले किसी स्थान का नाम और वह स्थान कितने किलोमीटर की दूरी पर है वह संख्या लिखी रहती है। इनकी ऊंचाई लगभग समान होती है और आकार भी एक जैसा ही होता है, लेकिन इनके ऊपरी गोलाकार सिरे का रंग अलग होता है। किसी का रंग हरा होता है तो किसी का नारंगी। कोई नीला होता है, कोई पीला तो कोई काला। ऐसे में बहुत से लोगों के दिल में यह ख्याल आता होगा कि यह पत्थर लगाने का सिलसिला आखिर कब से शुरू हुआ और इनके अलग-अलग रंग का मतलब क्या है।

सड़क पर किसी मार्कर या मार्गदर्शक की तरह खड़े पत्थर का ऊपरी सिरा जब पीला हो तो समझ जाइए कि आप राष्ट्रीय राजमार्ग पर हैं। अगर पत्थर का रंग हरा हो तो आप राज्य राजमार्ग पर हैं। अगर संगमील काले रंग में रंगा दिखे तो अब आप सफर करते हुए किसी बड़े शहर या जिले में प्रवेश कर चुके हैं। नारंगी रंग के मील के पत्थर का अर्थ है कि आप किसी गांव में पहुंच चुके हैं। ये सड़कें प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के अंतर्गत बनाई जाती हैं।

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Web Title: Milestones tell, now the floor is not far

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