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हर साल आषाढ़ की शुक्ल पक्ष की द्वितिया तिथि को भगवान जगन्नाथ की विश्व प्रसिद्ध रथयात्रा निकाली जाती है। ये मुख्य तौर पर ओडिशा में निकाली जाती है।

इस विशाल रथयात्रा में भगवान जगन्नाथ, भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा की प्रतिमाओं को तीन अलग-अलग भव्य और विशाल रथों पर नगर भ्रमण कराया जाता है।

ये प्रतिमाएं अलग-अलग ओडिशा के अलग-अलग हिस्सों से लाए गए नीम के विशेष वृक्षों से ही निर्मित की जाती हैं।

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नीम के इन विशेष वृक्षों को दारू कहा जाता है उल्लेखनीय है कि इसके लिए जगन्नाथ मंदिर एक खास समिति का गठन करती है, जो नीम के स्वस्थ और शुभ पेड़ की पहचान करती है।

भगवान जगन्नाथ का रंग सांवला होता है, इसलिए समिति यह सुनिश्चित करती है कि नीम के वृक्ष की लकड़ी गहरे रंग की होनी चाहिए चूंकि भगवान जगन्नाथ के भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा का रंग गोरा है, इसलिए उनकी प्रतिमाओं के निर्माण के लिए हल्के रंग का नीम का वृक्ष ढूंढा जाता है।

नीम के पेड़ (दारु) में चार प्रमुख शाखाएं होनी अनिवार्य है, नीम के पेड़ के पास में तालाब या चीटियों की बांबी या श्मशान का होना जरूरी है।

नीम के उस पेड़ को प्रमुखता दी जाती है, जिसकी जड़ में सांप का बिल होता है, नीम का वह किसी तिराहे के पास हो या फिर तीन पहाड़ों से घिरा हुआ होना चाहिए।

नीम के उस पेड़ के पास वरूण, सहौदा और बेल का वृक्ष होना चाहिए।

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Web Title: jagannath rath yatra 2018

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