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अमृतसर  : अमृतसर के सिविल अस्पताल में स्थित मदर एंड चाइल्ड केयर सैंटर में यदि वैंटीलेटर की सुविधा होती होती तो शायद इस माह 2 ‘मासूमों’ को बचाया जा सकता था। रविवार को गुरु नानक देव अस्पताल से बेबे नानकी मदर एंड चाइल्ड केयर सैंटर में 2 दिन के नवजात शिशु की मौत हो गई, क्योंकि सिविल अस्पताल में पिडियैट्रिक्स इंटैसिव केयर (पीकू) के न होने से इस नवजात को शनिवार को गुरु नानक देव अस्पताल के बेबे नानकी मदर एंड चाइल्ड केयर सैंटर में रैफर कर दिया गया था। इससे पहले 8 दिसंबर को भी गोलबाग से मिली एक दिन की नवजात बच्ची को इसलिए गुरु नानक देव अस्पताल में रैफर किया गया था, क्योंकि यहां पर वैंटीलेटर की सुविधा नहीं थी और बच्ची की हालत गंभीर थी। इस बच्ची ने भी गुरु नानक देव अस्पताल के बेबे नानकी व मदर एंड चाइलड केयर सैंटर में दम तोड़ दिया था।

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बच्चों को गंभीरावस्था में यदि वैंटीलेटर पर रखने की जरूरत पड़ती है तो उसे यहां से गुरु नानक देव अस्पताल के बेबे नानकी मदर एंड चाइल्ड केयर सैंटर में रैफर किया जाता है, क्योंकि सिविल अस्पताल में बच्चों के लिए कोई भी वैंटीलेटर मौजूद नहीं है। वहीं गुरु  नानक देव अस्पताल के मदर एंड चाइल्ड केयर सैंटर की 7वीं मंजिल पर बनाए गए छोटे बच्चों के लिए पीकू यूनिट कृत्रिम सांस लेने के लिए रखे गए 4 वैंटीलेटरों में से 2 खराब पड़े हुए हैं। यदि यह वैंटीलेटर ठीक होते तो शायद 22 दिसंबर शनिवार को जिस बच्चे को किसी ने बड़ी बेरहमी से हावड़ा मेल के शौचालय में बने पॉट में उसके गले में रस्सी बांधकर डाल दिया था तो शायद उस बच्चे की जान बच सकती थी।

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इसी तरह 2 सप्ताह पहले 8 दिसंबर को कड़कती ठंड में गोलबाग में एक छोटी बच्ची मिली थी। उसे भी प्राथमिक उपचार के लिए सिविल अस्पताल में भर्ती करवाया गया था, जिसकी हालत गंभीर होने पर उसे गुरु  नानक देव अस्पताल में रैफर कर दिया गया था। उसकी भी जान बचाई नहीं जा सकी थी।
सिविल अस्पताल के डाक्टरों का तर्क है कि जिस शहर में सरकारी मैडीकल कालेज होता है, वहां के सिविल अस्पताल में बच्चों के लिए अलग से वैंटीलेटर नहीं रखे जाते हैं, क्योंकि इसके लिए एक पूरा विभाग कायम करना पड़ता है। अकेले वैंटीलेटर लाए जाने से कुछ नहीं होगा।

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वहीं बेबे नानकी मदर एंड चाइल्ड केयर सैंटर में बच्चों के लिए बनाए गए इंटैंसिव केयर यूनिट में 4 वैंटीलेटरों में से 2 खराब पड़े हुए हैं। यूनिट के इंचार्ज डा. अश्वनी सरीन कहते हैं कि वैंटीलेटर से भी अधिक जरूरी स्टाफ है। मंगवाने का तो वे 10 वैंटीलेटरों का ऑर्डर कर दें, लेकिन जब वैंटीलेटर पर डाले के बच्चों की देखभाल के लिए स्टाफ नर्स ने ही नहीं होंगी तो इन वैंटीलेटरों का कोई औचित्य नहीं है। उन्होंने कहा कि इस समय अस्पताल में नर्सिंग स्टाफ की भारी शॉर्टेज चल रही है। सुबह की शिफ्ट में तो ठीक है लेकिन कई बार ऐसी स्थिति आ जाती हैं शाम को एक या 2 स्टाफ नसोर्ं से काम चलाना पड़ता है। इन नसोर्ं के ऊपर भी वार्ड में दाखिल 30 से 40 बच्चों देखभाल की जिम्मेदारी होती है जोकि उनके लिए संभव नहीं। इसी तरह वैंटीलेटर पर डाले जाने वाले हर एक बच्चे को बार-बार देखने के लिए नर्स की आवश्यकता होती है, जबकि यहां पर नसोर्ं की भारी कमी है।

उन्होंने कहा कि वैंटीलेटरों से कहीं अधिक जरूरी है कि अस्पताल में स्टाफ की कमी को दूर किया जाए। उन्होंने माना कि 4 वैंटीलेटर में से 2 वैंटीलेटर तक खराब पड़े हुए हैं और इनकी ए.एम.सी. नहीं हुई थी। उम्मीद है कि एक-दो दिनों में इनकी ए.एम.सी. हो जाएगी और इन्हें ठीक करवा दिया जाएगा।

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Web Title: If the ventilator were to be saved then both innocent

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