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नई दिल्ली: चुनाव आज भी जाति और धर्म के आधार पर ही लड़े जाते हैं। जातीय पहचान और धार्मिक विवाद जैसे मुद्दों पर अकसर चुनाव के दौरान वोटों का बंटवारा होता है। 1962 से लेकर 2014 के लोकसभा चुनाव के आंकड़ों को देखें तो पता चलता है कि शिक्षा में असमानता, आमदनी या रोजगार जैसे मुद्दों का चुनाव के दौरान मामूली असर रहता है।

एम.आई.टी. के अर्थशास्त्री अभिजीत बनर्जी और पैरिस स्कूल ऑफ इकनॉमिक्स के ऐमरी गेथिन और थॉमस पिकेटी की रिसर्च में यह तथ्य निकलकर सामने आया है। रिसर्च के मुताबिक मतदाता अपना वोट किसे देंगे, यह तय करने में मूलभूत समस्याओं की कोई खास भूमिका नहीं होती है। इस रिसर्च के दौरान सर्वे और इलैक्शन रिजल्ट का बारीकी से अध्ययन किया गया। 

विधानसभा चुनाव में भी ट्रेंड बरकरार  : विधानसभा चुनाव में भी सामाजिक वर्ग की बजाए जाति और धर्म ही वोटरों का मूड तय करने में 2 बड़े फैक्टर रहे। जिन राज्यों में भाजपा बड़े घटक की भूमिका में थी, वहां उसे एस.सी./एस.टी. और मुस्लिम मतदाताओं के मुकाबले अगड़ी जाति का ज्यादा समर्थन मिला। 

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Web Title: Caste and religion still decide the mood of voters

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