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देश ही नहीं, बल्किविदेश में भी अगर कहीं कोई आफत आती है तो हम भारतीय उस पीड़ा को भी अपनी ही पीड़ा समझते हैं। अपने ही नहीं, अगर कभी दुश्मन पर भी कोई कुदरती आफत आन पड़े तो हमें लगता है कि यह आफत भी हमारे ही ऊपर आन पड़ी है। नेपाल में जब भूकंप आया तो पूरे भारत के हरेक व्यक्ति ने यही महसूस किया जैसे यह भूकंप उसके अपने घर में ही आया है। हमने उस दर्द को अपना ही दर्द समझा जो नेपालियों के जीवन में आया था, लेकिन जब पाकिस्तान को भूकंप ने थर्राया तो उसे भी हमने बेगाना नहीं समझा। हमारे प्रधानमंत्री ने सबसे पहले पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री को सहायता की पेशकश की।

और आज तो हमारे अपने, अपने केरल के लोग मुसीबत में घिर गए हैं, मुसीबत भी ऐसी कि जो बेघर हो गए हैं वो यह भी नहीं जान सकते कि उनका घर बचा भी है कि नहीं। जिनके परिजन लापता हैं वे यह भी नहीं जानते कि वे जीवित भी हैं कि नहीं? उन्हें जब बाढ़ में से सुरक्षा बल निकालकर लाए तो वह यह भी नहीं सोच पाए कि दुकानें, घर, कारोबार, व्यापार, मवेशी, जो वे छोड़कर जान बचाने के लिए छोड़ आए  हैं, उनके बाद उनका क्या हुआ होगा या क्या होगा। 

आफत ही इतनी बड़ी थी कि सारा ध्यान बस इसी और था कि किसी प्रकार से कोई राहत और सहायता आ जाए तो वे मुंह फाड़े बह रहे उस पानी से किसी प्रकार बच कर निकल जाएं जो काल बन कर उन्हें निगल जाना चाहता है। वे किसी तरह से जान बचाकर राहत शिविर तक पहुंच गए हैं लेकिन उनकी आंखों के सामने अंधेरे के सिवाए और कुछ नहीं है। इस अंधेरे को रोशनी में बदलना है, सहायता रूपी एक दीप जलाना है और उस दीप को तब तक बुझने नहीं देना है जब तक एक भी बाढ़ प्रभावित केरल वासी के जीवन में रोशनी नहीं लौट आती। 
दैनिक सवेरा ने दीप प्रज्वलित कर दिया है, ‘प्रधानमंत्री रिलीफ फंड (केरल)’ की स्थापना कर दी गई है,  अब आपने इस दीप को जलाकर रखना है। अपने सामथ्र्य के अनुसार सहायता राशि आप भेजते रहिए ताकि यह दीप जलता रहे। बस एक ही काम कीजिए, धरती मां की पुकार सुनिए और ज्योत से ज्योत जलाते रहिए।

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Web Title: Blow the flames, flame the flame from the flame!

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