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नई दिल्लीः आधी सदी से अधिक समय तक देश पर शासन करने वाली कांग्रेस को सत्तर के दशक से कई बार खराब हालात से गुजरना पड़ा और ऐसी स्थिति में जब उत्तर और पूर्व क्षेत्र में उसके पैर उखड़ गये तब दक्षिण और पूर्वोत्तर उसके साथ खड़ा दिखायी दिया।
 
देश के चुनावी इतिहास पर नजर डाली जाये तो कांग्रेस को सत्तर के दशक से लेकर अब तक कम से कम छह बार जनता की नाराजगी का सामना करना पड़ा। ऐसे समय में जब उसका उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल जैसे उत्तर, मध्य और पूर्व के राज्यों में सफाया हो गया तब भी दक्षिण के कई राज्यों ने मजबूती से उसका साथ दिया। दक्षिणी राज्यों के अलावा महाराष्ट्र और असम भी कांग्रेस के बुरे समय में उसके साथ खड़े दिखायी दिये। कई बार देश में कांग्रेस के विरुद्ध बने माहौल का आन्ध्र प्रदेश, कर्नाटक , केरल , महाराष्ट्र और असम में असर तक नजर नहीं आया।

आजादी के बाद से केंद्र में लगातार सरकार चला रही कांग्रेस को पहली बार 1977 में सत्ता विरोधी लहर का सामना करना पड़ा। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांंधी द्वारा 1975 में देश में आपातकाल लागू किये जाने के विरुद्ध नाराजगी का असर 1977 के चुनाव में देखने को मिला। कांग्रेस के विरुद्ध चली ‘जनता लहर’  में उसके पैर उखड़ गये और वह सत्ता से बाहर हो गयी। देशव्यापी नाराजगी के बावजूद कांग्रेस इस चुनाव में 154 सीटें जीती थी। उत्तर और मध्य भारत में  उसका लगभग सफाया हो गया था। उस समय दक्षिण और पश्चिम के राज्यों ने उसका साथ दिया था। उसे आन्ध्र प्रदेश में 41 , कर्नाटक में 26 , गुजरात और असम में दस  - दस, केरल में 11, महाराष्ट्र में 20 तथा तमिलनाडु में 14 सीटें मिली थी।

कांग्रेस को 1977 के बाद  1989 , 1996 , 1998 , 1999 और 2014 में सत्ता विरोधी लहर के कारण बुरी स्थिति का सामना करना पड़ा। वर्ष 1989 में भ्रष्टाचार विशेषकर बोफोर्स दलाली के मुद्दे को उछाल कर लड़े गये चुनाव में सत्ता विरोधी लहर के कारण राजीव गांधी सरकार चली गयी थी और जनता दल नेता विश्वनाथ प्रताप सिंह सरकार बनाने में कामयाब हो गये थे । इस चुनाव में उत्तर प्रदेश , बिहार , उड़सिा और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में पैर उखड़ जाने के बावजूद कांग्रेस को 197 सीटें मिली थी।  दक्षिण और पूर्वोत्तर के राज्यों के अलावा महाराष्ट्र उसके साथ खड़ा रहा था। इस चुनाव में कांग्रेस को जहां उत्तर प्रदेश में 15 , बिहार में चार , गुजरात में तीन , हरियाणा में चार , मध्य प्रदेश में आठ , उड़सिा में तीन , पंजाब में दो और पश्चिम बंगाल में चार सीटें मिली थी  वहीं उसे आन्ध्र प्रदेश में 39 , कर्नाटक में 27 , केरल में 14 और महाराष्ट्र में 28 सीटें मिली थी । पूर्वोत्तर क्षेत्र की अधिकतर सीटें कांग्रेस को मिली थी।


वर्ष 1996 में सत्ता विरोधी लहर के कारण कांग्रेस की पी वी नरसिंह राव सरकार पांच साल का अपना कार्यकाल पूरा कर दोबारा सत्ता नहीं लौट सकी और भारतीय जनता पार्टी के नेता अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में सरकार बनी जो 16 दिन ही चल सकी थी । बाद में यूनाईटेड फ्रंट की सरकार बनी जिसमें एच डी देवगौड़ा और इन्द्र कुमार गुजराल प्रधानमंत्री बने। 

देवगौड़ा 324 दिन और गुजराल 332 दिन सत्ता में रहे । इस चुनाव में कांग्रेस को 140 सीटें मिली थी । उत्तर प्रदेश , बिहार , हरियाणा और पंजाब में उसे गहरा झटका लगा था । उत्तर प्रदेश में उसे पांच , बिहार में दो , हरियाणा में और पंजाब में दो- दो तथा मध्य प्रदेश में आठ सीटें मिली थी । कांग्रेस विरोध के बावजूद इस पार्टी को आन्ध्र प्रदेश में 22 , असम में पांच , गुजरात में दस , कर्नाटक में पांच , केरल में सात , महाराष्ट्र में 15 , उड़सिा में 16 राजस्थान में 12 तथा पश्चिम बंगाल में नौ सीटें मिली थी । 


वर्ष 1998 के आम चुनाव में भी कांग्रेस विरोध जारी रहा और इस चुनाव में वह 141 सीट पर सिमट गयी थी और भाजपा नेता अटल बिहारी वाजपेयी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार बनाने में सफल हुए थे  इस चुनाव में उत्तर प्रदेश और दिल्ली में कांग्रेस का सफाया हो गया था तथा बिहार , गुजरात , हरियाणा और पश्चिम बंगाल में वह बेहद कमजोर हो गयी थी । बिहार में उसे पांच , गुजरात में सात , हरियाणा में तीन तथा पश्चिम बंगाल में एक सीट मिली थी।

कांग्रेस को इस चुनाव में आन्ध्र प्रदेश में 22 , असम में दस , कर्नाटक में नौ , केरल में आठ , महाराष्ट्र में 33, राजस्थान में 18 , मध्य प्रदेश में दस और ओडिसा में पांच सीटें मिली थी।

कांग्रेस विरोध का सिलसिला 1999 के चुनाव में भी दिखा और अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की दोबारा सरकार बनी। इस चुनाव में भी कांग्रेस कोई करिश्मा नहीं कर सकी और 114 सीट जीत कर संसद में अब तक के सबसे कम सीट पर पहुंच गयी थी। इस चुनाव में उसे कर्नाटक में 18 , महाराष्ट्र में दस , केरल में आठ , असम में दस , मध्य प्रदेश में 11 , पंजाब में आठ ,राजस्थान में नौ , और गुजरात में छह सीटें मिली थी । कांग्रेस को उत्तर प्रदेश में दस , बिहार में चार , पश्चिम बंगाल में तीन , उड़सिा एवं तमिलनाडु में दो - दो सीटें मिली थी ।       

मनमोहन सिंह सरकार के दस वर्ष के शासन के दौरान भ्रष्टाचार को लेकर 2014 में उपजे सत्ता विरोधी लहर ने संसदीय इतिहास में कांग्रेस को अब तक की सबसे बुरी स्थिति 44 सीटों पर पहुंचा दिया था । इस चुनाव में गुजरात , हिमाचल प्रदेश , जम्मू कश्मीर , झारखंड, दिल्ली , ओडिशा , राजस्थान और तमिलनाडु में कांग्रेस खाता भी नहीं खोल सकी थी । उसे कर्नाटक में उसे नौ , केरल में आठ , पश्चिम बंगाल में चार , पंजाब में तीन , मध्य प्रदेश ,महाराष्ट्र  , मणिपुर  में दो - दो तथा हरियाणा , छत्तीसगढ़ , मेघालय और मिजोरम में एक - एक सीट मिली थी । आन्ध्र प्रदेश में दो , अरुणाचल प्रदेश में एक , असम में दो ,बिहार में दो , और उत्तर प्रदेश में दो सीटें मिली थी।
 

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Web Title: When the bad times of Congress came, these states joined the party

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