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यह मोहब्बत का तीर, जिगर के पार हो जाता है पता भी नहीं चलता, न जाने कब प्यार हो जाता है इस बारे में एक बात तो तय है कि दुनिया चाहे कुछ भी बोलती रहे, प्यार करने वाले इस बेकार के विवाद में नहीं फंसते कि प्यार और पहली नजर में कोई रिश्ता होता है या नहीं, लेकिन न्‍यूयॉर्क स्थित हेमिल्‍टन कॉलेज के साइक्‍लॉजिस्‍ट रवि थिरूचसेलवम ने अपने एक शोध में महिला और पुरुषों की टीम को कुछ फोटो दिखाई गई। 

इसके बाद लोगों के दिमाग से एक तार अटैच किया और मॉनीटर पर उनके आकर्षण के विभिन्‍न स्‍तर को पिक्‍चर में देखा। फिर उन्‍होंने प्रतिभागियों को वही स्‍नैप्‍स दूसरी बार दिखाई और उनको रेटिंग दिया। जिन लोगों से टीम के लोगों ने दोबारा मिलना चाहा उस तस्‍वीर को दोबारा दिखाया तो आकर्षण में बढ़ोत्‍तरी दिखी। तस्‍वीर को जब चौथी बार दिखाया गया तो लोगों के दिमाग में एक्‍साइटमेंट और खुशी दोनों में तीव्रता पाई गई। 

बिना भरोसे के प्‍यार: प्‍यार पर हुए रिसर्च बताते हैं कि इसमें भरोसे का होना बहुत जरूरी है। बिना भरोसे प्‍यार नही हो सकता है। इसीलिए पहली नजर में प्‍यार होने का कोई चांस नही है। जब आप अपने पार्टनर के साथ कई बार मिलते हैं उनके साथ थोड़ा समय बिताते हैं एक दूसरे के प्रति भरोसा बढ़ता है। जो दोनों के बीच होने वाले प्‍यार के लिए बहुत जरूरी है। 

लव फिवर और लव अटैक
एक तो होता है लव फिवर और दूसरा होता है लव अटैक। इन दोनों से श्रेष्ठ है सिन्क्रॉनिसिटी इमोशन। इसके होने पर न तो फिवर होता है और न ही अटैक, क्योंकि इसमें किसी प्रकार की चाहत या आकर्षण नहीं होता। 

ये आंखों में देखने से घटित होता है, और बहुत चुपचाप जब भी कोई बड़ी घटना घटती है पूरा वर्तमान कुछ क्षण के लिए मौन हो जाता है। ओशो ने इस शब्द के अर्थ को बहुत अच्छे से समझाया है वे मानते थे कि दो हृदयों का अकारण एक साथ धड़कना या फिर एक खास लय बद्ध भाव में होना ही सिन्क्रॉनिसिटी है। इसे पहली नजर का प्यार नहीं कह सकते, क्योंकि पहली से यह पता चलता है कि दूसरी भी नजर हो सकती है। 

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Web Title: love is at first sight is not true research said

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