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अक्सर हाई ब्लड प्रैसर (बी.पी.) के पेशंट बीच में ही दवा लेना छोड़ देते हैं, लेकिन ऐसा करना काफी खतरनाक होता है। इस बारे में मैक्स अस्पताल के ट्रांस रेडियल इंटरवैंशनल प्रोग्राम के डायरैक्टर डा. राजीव राठी का कहना है कि हाई बी.पी. एक साइलेंट किलर है और एक ऐसी स्थिति है जो समय के साथ हार्ट, ब्रेन, किडनी व आंखों जैसे महत्वपूर्ण अंगों को प्रभावित कर सकता है। उनका कहना है कि देश में करीबन 2.6 लाख लोग हाई बी.पी. के कारण मौत का शिकार हो जाते हैं। यह देश की सबसे पुरानी बीमारी बन गई है। हाई बी.पी. और इसके कारण होने वाली स्वास्थ्य समस्याओं के मैनेजमैंट और रोकथाम के लिए लाइफस्टाइल में बदलाव करना बेहद महत्वपूर्ण है। 

यह भी है एक आंकड़ा 
हाई बी.पी. से गुजर रहे 50 प्रतिशत से अधिक भारतीय अपनी स्थिति से अंजान हैं। हैरानी की बात तो यह है कि प्रत्येक 7 मरीजों में से केवल 13 प्रतिशत मरीज यानी की एक या एक से भी कम मरीज हाई बी.पी. को कम करने की दवा खाते हैं। इसके साथ ही 10 में से केवल एक व्यक्ति ही ऐसा है जो हाई बी.पी. पर कंट्रोल रख पाता है। हाई बी.पी. के मरीजों में केवल 13 प्रतिशत ही मरीज ऐसे होते हैं जो डाक्टर के बताए अनुसार दवाई लेते हैं। ऐसे में जरूरत है कि लोगों को जागरूक किया जाए कि यदि वह हाई बी.पी. की दवा नहीं खाते और इसका इलाज नहीं करते तो यह शरीर के अन्य अंगों को भी परिभाषित कर सकता है। 

यह कहती है स्टडी 
हाइपरटैंशन को ऐसे ब्लड प्रैशर के रूप में परिभाषित किया जाता है जो 140/90 मि.मी. एच.जी. के स्तर से लगातार अधिक होता है। लक्षणों की कमी के कारण यह स्थिति वास्तविक शुरुआत के कुछ साल बाद ही पता चल पाती है। इसलिए एहतियाती उपाय जरूरी हैं। विशेषकर उन लोगों में जिनके परिवार में पहले भी किसी को यह परेशानी रह चुकी हो। हाल ही में 6,13,815 पेशंट्स पर हुई स्टडी से पता चला है कि एच.जी .सिस्टोलिक ब्लड प्रैसर में 10 मि.मी. की कमी लाने से भी हार्ट फेल्यिर, ब्रेन हैमरेज, दिल का दौरा पड़ने और मौत की घटना में उल्लेखनीय कमी आ सकती है।

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Web Title: High blood pressure medicine

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