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प्रमोद जी का व्यापार काफी फला फूला हुआ था। उनकी दो चांद-सी बेटियां थी। पत्नी भी अच्छी-खासी पढ़ी लिखी थी। शुरू में तो प्रमोद जी की पत्नी बच्चों की शिक्षा में काफी दिलचस्पी लेती थी और बेटियां भी पढ़ाई में अच्छी थी परंतु पैसा अधिक होने पर प्रमोद जी की पत्नी भी कई महिला क्लबों से जुड़ गई। पति तो पहले से ही व्यस्त थे। इस प्रकार धीरे-धीरे बच्चे भी पढ़ाई से लापरवाह होते गए। 

श्रीमती प्रमोद को तो तब झटका लगा, जब पता चला कि प्री बोर्ड में उनकी बड़ी बेटी फेल हो गई है। स्कूल से बुलाए जाने पर उनको इस बात की जानकारी मिली। दूसरी बेटी की अध्यापिका ने भी उनको बताया कि वह भी पढ़ाई में पिछड़ती जा रही है। माता-पिता ने बच्चों से पूछा और डांटा कि हमने तुम्हें क्या कमी दी है? ट्यूशन भी दो-दो रखवा दी हैं, फिर इतने कम अंक कैसे मिले। 

दोनों बेटियों का एक ही जवाब था, ‘पापा, यही उम्र मौज मस्ती की है। इस उम्र में मस्ती नहीं करेंगे तो कब करेंगे। भगवान ने खूब पैसा दिया है हमारे मातापिता को।’श्रीमती सविता एक कालेज की प्राचार्य हैं। उनका इकलौता बेटा मयंक इस घमंड में रहता है कि मुझे तो कहीं भी दाखिला आसानी से मिल सकता है। मेरी मम्मी की तो शिक्षा विभाग में बहुत जान पहचान है। 

मुझे बहुत मेहनत करने की क्या आवश्यकता है। इस प्रकार मयंक 6० प्रतिशत नम्बरों से पास हुआ और माता की ऊंची पहुंच होने पर उसे इंजीनियरिंग कालेज में दाखिला तो मिल गया परन्तु अब उसे परिश्रम न करने की आदत पड़ चुकी थी। इस प्रकार दूसरे साल वह इंजीनियरिंग कालेज में फेल हो गया। मां की बहुत सिफारिश से उसे तीसरे साल में भेज दिया गया परन्तु फिर वही हाल। वह कभी इंजीनियर न बन सका।

* माता-पिता को कभी भी अपनी ऊंची हैसियत का ढिंढोरा बच्चों के आगे नहीं पीटना चाहिए।

* बच्चों को यह महसूस न होने दें कि ऊंची सिफारिश से या ऊंची ताकत से आप उनका काम करवा सकते हैं।

* बच्चों को शुरू से ही सीमित जेब खर्च दें ताकि वे सीमा में खर्च करना सीख सकें।

* पैसा होने पर भी बहुत अधिक भौतिक सुविधाएं न जुटाएं।

* बच्चों को आर्थिक रूप से अधिक आजादी न दें।

* बच्चों के सामने अपने व्यवसाय में कितना लाभ हुआ है इसकी जानकारी न दें, न ही यह जानकारी दें कि यदि मुझे यह प्रोजैक्ट मिल जाता है तो मुझे इतना मुनाफा होगा।

* बच्चों के सामने अपनी पत्नी या अपने मित्रों से कारोबार की लाभ-हानि की चर्चा न करें।

* यदि स्वयं किसी अच्छे या ताकत वाले ओहदे पर हैं तो बच्चों के आगे शेखी न बघारें कि मैं यह कर सकता हूं या वो करवा सकता हूं।

* घर की आवश्यक बड़ी वस्तु एकदम बच्चों के कहने पर न लाएं। अच्छी तरह से सोच समझ कर परामर्श करके ही दिलवाएं। खरीदते समय बच्चों को अहसास करवाएं कि इस चीज पर पैसा खर्चने से पूर्व उन्हें काफी मेहनत करनी पड़ी या आपातकाल में काम आने वाली जमा पूंजी से निकलवा कर घर या आपकी जरूरत पूरी की है।

* बच्चों को कुछ अभाव का भी अहसास करवाएं जिससे वे जिम्मेदार बन सकें और दूसरों की मजबूरी का मजाक न उड़ा कर उनकी मजबूरियों को समझ सकें।

* शिक्षा के प्रति लापरवाही न बरतें। आवश्यकता पड़ने पर पुस्तकें, ट्यूशन आदि का प्रबंध करें और स्वयं भी अच्छे माता-पिता की जिम्मेवारी निभाएं।

* माता-पिता भी अपने शौक सीमित रखने का प्रयास करें जिससे अधिक अमीरी न झलके। अपने बच्चे को अच्छा नागरिक बनाने में उसके सहायक बनें। उसकी जिम्मेदारियों का अहसास करवाते रहें। अपनी ऊंची हैसियत और ताकत से बच्चे को आदर्श नागरिक बनने से न रोकें।

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Web Title: side effects of giving facilities to your child

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