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हर देश और हर राज्य के अपने-अपने लोकगीत और लोकपर्व होते हैं जिसे वहां के सभी लोग धूम-धाम से मनाते हैं। सभी जानते हैं कि अनेकों धर्म और पर्वों का मिश्रण है भारत। हमारे भारत में सभी राज्यों और लोकपर्वों को धूम-धाम से मनाया जाता है। आज हम आपको उत्तराखंड के लोकपर्व फूलदेई के बारे में बताएंगे-

आज से चैत का महीना उत्तराखंडी समाज के बीच विशेष पारंपरिक महत्व रखता है। चैत की संक्रांति यानी फूल संक्रांति से शुरू होकर इस पूरे महीने घरों की देहरी पर फूल डाले जाते हैं। इसी को गढ़वाल में फूल संग्राद और कुमाऊं में फूलदेई पर्व कहा जाता है। फूल डालने वाले बच्चे फुलारी कहलाते हैं। फूल संक्रांति 15 मार्च की सुबह 5 बजकर 20 मिनट से शुरू हो गई है।

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यह मौल्यार (बसंत) का पर्व है। इन दिनों उत्तराखंड में फूलों की चादर बिछी दिखती है। बच्चे कंडी (टोकरी) में खेतों-जंगलों से फूल चुनकर लाते हैं और सुबह-सुबह पहले मंदिर में और फिर हर घर की देहरी पर रखकर जाते हैं। 

माना जाता है कि घर के द्वार पर फूल डालकर ईश्वर भी प्रसन्न होंगे और वहां आकर खुशियां बरसाएंगे। इस पर्व की झलक लोकगीतों में भी दिखती है। उत्तराखंडी लोकगीतों का फ्यूजन तैयार करने वाले पांडवाज ग्रुप के लोकप्रिय फुल्यारी गीत में फुलारी को सावधान करते हुए कहा गया है-

इस तरह खेलेंगे होली तो धन लाभ के साथ घर में आएगी सुख-शांति बदलते वक्त के साथ पर्व को मनाने का ढंग भी बदला है। बता दें इस पर्व का समापन बिखौती (13 अप्रैल की बैसाखी) को होता है, जब फुलारी को टीका लगाकर पैसे, गुड़, स्वाली-पकौड़ी (पकवान) या कोई भी गिफ्ट देकर विदा किया जाता है। बिखौती के दिन उत्तराखंड में जगह-जगह मेले लगते हैं।

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Web Title: phooldei festival of uttrakhand

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