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सूही महला ३ ॥ सबदि सचै सचु सोहिला जिथै सचे का होइ वीचारो राम ॥ हउमै सभि किलविख काटे साचु रखिआ उरि धारे राम ॥ सचु रखिआ उर धारे दुतरु तारे फिरि भवजलु तरणु न होई ॥ सचा सतिगुरु सची बाणी जिनि सचु विखालिआ सोई ॥ साचे गुण गावै सचि समावै सचु वेखै सभु सोई ॥ नानक साचा साहिबु साची नाई सचु निसतारा होई ॥१॥ 

हे भाई! जिस मनुख के हिर्दय घर में सच्चे सहबद के द्वारा सदा थिर प्रभु की सिफत सलाह का गीत होता रहता है, सदा-थिर प्रभु के गुणों की विचार होती रहती है, उस के अंदर से अहंकार आदि सारे पाप कट जाते हैं, वेह मनुख सदा कायम रहने वाले परमात्मा को अपने हिर्दय घर में बसी रखता है और मुश्किल से पार होने वाले संसार सागर से पार निकल जाता है। संसार सागर से बार बार पार जाने की जरुरत नहीं रहती। हे भाई! जिस गुरु ने उसको सदा-थिर प्रभु का दर्शन करा दिया है, वह सवयं भी प्रभु का रूप है, उस की बानी प्रभु की सिफत सलाह से भरपूर है। (गुरु की कृपा द्वारा) वह मनुख सदा- थिर प्रभु के गुण गता रहता है, उसी में लीं रहता है, और उस को हर जगह बसा देखता है। हे नानक! जो परमात्मा सवयं सदा-स्थिर है, जिस की महिमा सदा थिर है, वह मनुख को हमेशां के लिए संसार सागर से पार कर देता है।१।

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Web Title: Hukamnama Sri Harimandir Sahib Ji 21 May

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