Tungnath temple

भगवान शिव का सबसे ऊंचा मंदिर, जिसका निर्माण किया गया था पांडवों द्वारा

भारत के कोने-कोने में भगवान शिव के अनेकों चमत्कारी मंदिर हैं जहां भक्तों की टोली भोलेनाथ के दर्शन के लिए आते हैं। आज हम आपको भगवान शिव के सबस ऊंचे मंदिर के बारे में बताने जा रहे हैं, जहां आज की चमत्कार होते दिखाई देता है। यह चमत्कारी मंदिर है तुंगनाथ मंदिर- 

तुंगनाथ : यानि चोटियों का स्वामी-
तुंगनाथ मंदिर दुनिया का सबसे ऊंचा मंदिर है और यह मंदिर उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में “टोंगनाथ पर्वत” श्रृंखला में स्थित पांच और सबसे अधिक पंच केदार मंदिर हैं। यह मन्दिर समुद्र तल से लगभग 3,680 मीटर की ऊंचाई पर बना हुआ है तुंगनाथ (अर्थात् चोटियों का स्वामी) पर्वतों में मंदाकिनी और अलकनंदा नदी घाटियों का निर्माण होता है।

यह मंदिर 1000 वर्ष से भी अधिक पुराना माना जाता है और भगवान शिव को समर्पित है। इस मंदिर में भगवान शिव को “पंचकेदार” रूप में पूजा जाता है। तुंगनाथ मंदिर केदारनाथ और बद्रीनाथ मंदिर के लगभग बीच में स्थित है। यह मंदिर पंचकेदार के क्रम में दूसरे स्थान पर है।

दरअसल पंचकेदारों में द्वितीय केदार के नाम प्रसिद्ध तुंगनाथ की स्थापना कैसे हुई, यह बात लगभग किसी शिवभक्त से छिपी नहीं। कहा जाता है कि महाभारत के युद्ध के बाद पांडव अपनों को मारने के बाद व्याकुल थे। इस व्याकुलता को दूर करने के लिए वे महर्षि व्यास के पास गए। व्यास ने उन्हें बताया कि अपने भाईयों और गुरुओं को मारने के बाद वे ब्रह्म हत्या के कोप में आ चुके हैं। उन्हें सिर्फ महादेव शिव ही बचा सकते हैं।

कहा जाता है कि इसके बाद ही पांडवों ने ही इस मंदिर की स्थापना की थी। पंचकेदारों में यह मंदिर सबसे ऊंची चोटी पर विराजमान है। तुंगनाथ की चोटी तीन धाराओं का स्रोत है, जिनसे अक्षकामिनी नदी बनती है। मंदिर रुद्रप्रयाग जनपद में स्थित है और चोपता से तीन किलोमीटर दूर स्थित है।

तुंगनाथ मंदिर दुनिया का सबसे ऊंचा मंदिर है और यह मंदिर उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में “टोंगनाथ पर्वत” श्रृंखला में स्थित पांच और सबसे अधिक पंच केदार मंदिर हैं। यह मन्दिर समुद्र तल से लगभग 3,680 मीटर की ऊंचाई पर बना हुआ है तुंगनाथ (अर्थात् चोटियों का स्वामी) पर्वतों में मंदाकिनी और अलकनंदा नदी घाटियों का निर्माण होता है।

यह मंदिर 1000 वर्ष से भी अधिक पुराना माना जाता है और भगवान शिव को समर्पित है। इस मंदिर में भगवान शिव को “पंचकेदार” रूप में पूजा जाता है। तुंगनाथ मंदिर केदारनाथ और बद्रीनाथ मंदिर के लगभग बीच में स्थित है। यह मंदिर पंचकेदार के क्रम में दूसरे स्थान पर है।

हिमालय पर्वत की खूबसूरत प्राकर्तिक सुन्दरता के बीच बना यह मंदिर तीर्थयात्रियो और पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र है। चारधाम की यात्रा करने वालो यात्रियों के लिए यह मंदिर बहुत ही महत्वपूर्ण है। मंदिर के प्रवेश द्वार पर भगवान शिव के परम भक्त “नंदी” की मूर्ति निर्मित है, जो कि पवित्र स्थान का दर्शन कर रहा है। मंदिर के पुजारी मक्कामाथ गांव के स्थानीय ब्राह्मण होते हैं।

तुंगनाथ मंदिर की वास्तुशिल्प शैली गुप्तकाशी, मध्यम्हेश्वेर और केदारनाथ में मंदिरों के समान है। मंदिर की वास्तुकला उत्तरी भारतीय शैली से निर्मित है और मंदिर के आसपास अनेक देवताओं के कई छोटे-छोटे मंदिर हैं। मंदिर का पवित्र भाग एक पवित्र काली रॉक है , जो स्वयंमंडल या स्वयं प्रकट-लिंग है। मंदिर में बाड़े के अंदर स्थित मंदिर पत्थर से बने होते हैं और बाहर की तरफ चित्र दर्शाए होते हैं। मंदिर की छतों को भी पत्थर की स्लैब से बनाया गया है।

मंदिर के प्रवेश द्वार के दाईं ओर भगवान गणेश की एक छवि है। मंदिर के मुख्य अभयारण्य में ऋषि व्यास और काल भैरव (डेमी-देवता) की आशुट्ठु (आठ धातुओं की बनावट) मूर्तियों को भी स्थापित किया गया है।

मंदिर में पांडवों की छवियों और अन्य चार केदार मंदिरों के चांदी के सजीले टुकड़े भी शामिल हैं । देवी पार्वती (शिव की पत्नी) के लिए एक छोटा मंदिर और पंच केदार को समर्पित पांच छोटे मंदिरों का समूह भी है , जिसमें तुंगनाथ शामिल हैं।

पंच के सभी केदार तक पहुंचने के लिए पैदल चलना होता है और सभी पंच केदार ऊंचाई पर स्थित है। सर्दियों में यह सभी बंद हो जाते है क्यूंकि उस समय पूरा क्षेत्र बर्फ से ढका हुआ होता है।

मान्यता-
तुंगनाथ मंदिर के बारे में यह माना जाता है कि यह मंदिर पांडवों द्वारा भगवान शिवजी को प्रसन्न करने के लिए बनाया गया था, जो कि कुरुक्षेत्र में बड़े पैमाने पर रक्तपात से नाराज थे। इस मंदिर का निर्माण का श्रेय “अर्जुन” को जाता है, जो पांडवों के तीसरे भाई है। अर्जुन ने गंगा ग्रिह या पवित्र स्थान में स्थित भगवान की शस्त्रों का प्रतिनिधित्व करने वाली-लिंगम मंडल के साथ मंदिर का निर्माण किया।

श्रीराम से जुड़ा है ये मंदिर- वहीं एक अन्य मान्यता के अनुसार देवों के देव महादेव के पंच केदारों में से एक तुंगनाथ अन्य केदारों की तुलना विशेष महत्ता इसलिए भी रखता है क्योंकि यह स्थान भगवान राम से भी जुड़ा हुआ है। कहते हैं कि यहां रामचंद्र ने अपने जीवन के कुछ क्षण एकांत में बिताए थे।

पुराणों में कहा गया है कि रामचंद्र शिव को अपना भगवान मानकर पूजते थे। कहते हैं कि लंकापति रावण का वध करने के बाद रामचंद्र ने तुंगनाथ से डेढ़ किलोमीटर दूर चौदह हजार फीट की ऊंचाई पर चंद्रशिला पर आकर ध्यान किया था। रामचंद्र ने यहां कुछ वक्त बिताया था।