Shri Harimandir Sahib Ji

हुक्मनामा श्री हरिमंदिर साहिब जी 28 मई

सूही महला ४ घरु २ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ गुरमति नगरी खोजि खोजाई ॥ हरि हरि नामु पदारथु पाई ॥१॥ मेरै मनि हरि हरि सांति वसाई ॥ तिसना अगनि बुझी खिन अंतरि गुरि मिलिऐ सभ भुख गवाई ॥१॥ रहाउ ॥ हरि गुण गावा जीवा मेरी माई ॥ सतिगुरि दइआलि गुण नामु द्रिड़ाई ॥२॥ हउ हरि प्रभु पिआरा ढूढि ढूढाई ॥ सतसंगति मिलि हरि रसु पाई ॥३॥ धुरि मसतकि लेख लिखे हरि पाई ॥ गुरु नानकु तुठा मेलै हरि भाई ॥४॥१॥५॥

राग सूही , घर २ में गुरु राम दास जी की बाणी। अकाल पुरख एक है और सतगुरु की कृपा से प्राप्त होता है। गुरु की मत लेकर में अपने शारीर-नगर की अच्छी तरह खोज की है, और, (शारीर के अन्दर से ही ) परमात्मा के सुंदर नाम को खोज लिया है ॥੧॥ ( गुरु ने मुझे हर-नाम की दात दे कर ) मेरे मन में ठण्डक डाल दी है। (मेरे अन्दर से ) एक पल में ( माया की ) तृष्णा की आग बुझ गयी है । गुरु के मिलने से मेरी सारी (माया की ) भूख दूर हो गयी है ॥੧॥ रहाउ॥ हे मेरी माँ ! ( अब जैसे जैसे ) में परमात्मा के गुण गाता हु, मुझे आत्मक जीवन मिल रहा है। दया के घर सतगुरु ने मेरे हृदय में प्रभु के गुण पक्के कर दिये हैं , परमात्मा का नाम पका कर दिया है॥੨॥ अब में प्यारे हर-प्रभु की खोज करता हूँ , (सत-संगियों की तरफ से) खोज करता हूँ । साध सांगत में मिल कर में परमात्मा के नाम का स्वाद लेता हूँ ॥੩॥ सच्ची दरगाह से ( जिस मनुख के ) मस्तक के ऊपर प्रभु-मिलाप का लिखा लेख उभरता है, हे भाई ! उस ऊपर गुरु नानक प्रसन्न होता है और , उस परमात्मा को मिला देता है॥४॥१॥ ५॥