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विवेकपूर्ण ढंग से गुस्सा उतारें

भारत ने पिछले महीने से आयात-निर्यात, इंटरनेट और बुनियादी संस्थापनों के निर्माण आदि के क्षेत्रों में चीन के खिलाफ कदम उठाए। इसके बावजूद भारत का रेशम उद्योग चीन से अलग नहीं हो सकता, क्योंकि इसका कच्चा माल काफी हद तक चीन पर निर्भर है।

वाराणसी के रेशम गुरु मकबूल हुसैन ने कहा कि अगर चीन का रेशम नहीं मिला, तो भारत का रेशम उद्योग बहुत प्रभावित होगा। भारत में इस्तेमाल हो रहा करीब 80 प्रतिशत रेशम चीन से आता है। हालांकि वियतनाम और दक्षिण कोरिया में रेशम मिलता है, लेकिन इसका उत्पादन भारत की आवश्यकता की आपूर्ति नहीं कर सकता।

सिकंदराबाद के रेशम गुरु गजम गोवर्धन ने भी कहा कि सलेम और इरोड से पश्चिम बंगाल, राजस्थान और वाराणसी तक भारत के हर इलाके में रेशम उद्योग चीन पर निर्भर है। चीन के रेशम की लागत भारतीय रेशम के बराबर है, लेकिन भारत में उत्पादित रेशम धोने के बाद 25 प्रतिशत बर्बाद हो जाता है, जबकि चीनी रेशम को धोने की जरूरत नहीं होती।

भारत के कई सामाजिक संगठनों ने कहा कि भारत चीनी उत्पादों से अलग नहीं हो सकता। भारत के सबसे बड़े निर्यात संवर्धन संगठन ने कहा कि हालांकि भारत को चीनी उत्पादों पर निर्भरता कम करनी चाहिए, लेकिन अभी भारत चीन से आयात पर निर्भर है। चीनी वस्तुओं का बहिष्कार करना अव्यवहार्य है।

उधर भारतीय निर्यात संगठन संघ (एफआईईओ) के अध्यक्ष शरद कुमार सराफ ने कहा कि हम सरकार का समर्थन करते हैं, लेकिन हमें याद रखना चाहिए कि तमाम प्रमुख कच्चे माल के लिए हम चीन पर निर्भर रहते हैं। अगर वैसा ही माल भारतीय कंपनियां तैयार कर पाएं तो हमें चीनी वस्तुएं खरीदने की जरूरत नहीं होगी, लेकिन सभी चीनी उत्पादों पर प्रतिबंध लगाने से अंततः सिर्फ भारतीय निर्माताओं को नुकसान पहुंचेगा।

इस पर चीनी वाणिज्य मंत्रालय के प्रवक्ता काओ फंग ने कहा कि भारतीय उत्पाद और सेवा के खिलाफ चीन ने कोई प्रतिबंधात्मक और भेदभावपूर्ण उपाय नहीं उठाया। भारत की कार्रवाई विश्व व्यापार संगठन के संबंधित नियम और डब्ल्यूएचओ में भारत के वचन का उल्लंघन है।

जैसा कि चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि एक दूसरे का सम्मान और समर्थन करना चीन और भारत के लिए सही रास्ता है। यह दोनों देशों के दीर्घकालीन हित के अनुरूप है। सहयोग करना हमारे लिए एकमात्र सही विकल्प है।
(साभार- चाइना मीडिया ग्रुप, पेइचिंग)