29 feb 2020 hukumnama

हुक्मनामा श्री हरमंदिर साहिब जी 29 फरवरी

सलोक मः ३ ॥ कलि महि जमु जंदारु है हुकमे कार कमाइ ॥ गुरि राखे से उबरे मनमुखा देइ सजाइ ॥ जमकालै वसि जगु बांधिआ तिस दा फरू न कोइ ॥ जिनि जमु कीता सो सेवीऐ गुरमुखि दुखु न होइ ॥ नानक गुरमुखि जमु सेवा करे जिन मनि सचा होइ ॥१॥ मः ३ ॥ एहा काइआ रोगि भरी बिनु सबदै दुखु हउमै रोगु न जाइ ॥ सतिगुरु मिलै ता निरमल होवै हरि नामो मंनि वसाइ ॥ नानक नामु धिआइआ सुखदाता दुखु विसरिआ सहजि सुभाइ ॥२॥

अर्थ :-दुबिधा वाली हालत में (मनुख के सिर ऊपर) मौत का सहम टिका रहता है; (पर वह जम भी) भगवान के हुक्म में ही कार करता है, जिन को गुरु ने (‘कलि’से) बचा लिया वह (जम के सहम से) बच जाते हैं, मन के पिछे चलने वाले मनुष्यो को (सहम की) सजा देता है। जगत (भावार्थ, भगवान से बिछुड़ा जीव) यमकाल के वश में बंधा पड़ा है, उस का कोई राखा नहीं बनता; अगर गुरु के सनमुख हो के उस भगवान की बंदगी करें जिस ने यम पैदा किया है (तो फिर यम का) दुःख नहीं स्ताता, (उल्टा) हे नानक! जिन गुरमुखों के मन में सच्चा भगवान बसता है उन की यम भी सेवा करता है ।१। यह शरीर (हऊमै के) रोग के साथ भरा हुआ है, गुरु के शब्द के बिना हऊमै रोग-रूप दु:ख दूर नहीं होता; अगर गुरु मिल जाए तो मनुख का मन पवित्र हो जाता है (क्योंकि गुरु मिलिआँ मनुख) परमात्मा का नाम मन में बसाता है। हे नानक ! जिस जिस ने सुखदाई हरि-नाम सुमिरा है, उन का हऊमै-दु:ख सहिज सुभाइ दूर हो जाता है ।२।