Hukamna

हुक्मनामा श्री हरमंदिर साहिब जी 25 फरवरी

वडहंसु महला १ ॥ जिनि जगु सिरजि समाइआ सो साहिबु कुदरति जाणोवा ॥ सचड़ा दूरि न भालीऐ घटि घटि सबदु पछाणोवा ॥ सचु सबदु पछाणहु दूरि न जाणहु जिनि एह रचना राची ॥ नामु धिआए ता सुखु पाए बिनु नावै पिड़ काची ॥ जिनि थापी बिधि जाणै सोई किआ को कहै वखाणो ॥ जिनि जगु थापि वताइआ जालो सो साहिबु परवाणो ॥१॥

(हे भाई!) जिस परमात्मा ने जगत पैदा कर के इस को अपने आप में लीन करने की ताकत भी अपने पास रखी हुई है उस मालिक को इस कुदरत में वास करता समझ। (हे भाई!) सदा=थिर रहने वाले परमात्मा को (रची कुदरत से) दूर (किसी और जगह) खोजने का यतन नहीं काटना चाहिए। हरेक सरीर में उसी का हुकम बरतता पहचान। (हे भाई!) जिस परमात्मा ने यह रचना रची है उस को इस से दूर (कोई अलग) न समझो, (हर एक सरीर में) उस का अटल हुकम चलता पहचानो। जब मनुख परमात्मा का नाम सुमिरन करता है तब आत्मिक आनंद मनाता है (और विकारों का जोर भी इस पर नहीं आ सकता, परन्तु) प्रभु के नाम के बिना मनुखता विकारों को टक्कर दे जीतने में असमर्थ हो जाती है। जिस परमात्मा ने रचना रची है वोही इस की रक्षा की विधि भी जानता है, कोई जीव (उस के विपरीत) कोई (और) उपदेश नहीं कर सकता। जिस प्रभु ने जगत पैदा कर के (इस के ऊपर माया के मोह का) जाल बिशा रखा है वोही एक मशहूर जगत मालिक है (और वोही इस जाल में से जीवों को बचाने में समर्थ है।१।