hukamnama, हुक्मनामा श्री हरिमंदिर साहिब जी

हुक्मनामा श्री हरिमंदिर साहिब जी 18 मई

धनासरी महला ५ ॥ मोहि मसकीन प्रभु नामु अधारु ॥ खाटण कउ हरि हरि रोजगारु ॥ संचण कउ हरि एको नामु ॥ हलति पलति ता कै आवै काम ॥१॥ नामि रते प्रभ रंगि अपार ॥ साध गावहि गुण एक निरंकार ॥ रहाउ ॥ साध की सोभा अति मसकीनी ॥ संत वडाई हरि जसु चीनी ॥ अनदु संतन कै भगति गोविंद ॥ सूखु संतन कै बिनसी चिंद ॥२॥

हे भाई! मुझ आजिज को परमात्मा का नाम (ही ) सहारा है, मेरे लिए रोजगार कमाई के लिए परमात्मा का नाम ही रोजी है। मेरे लिए जोड़ने के लिए (भी) परमात्मा का नाम ही है। (जो मनुख हरी-नाम-धन इकट्ठा करता है) इस लोक में और परलोक में वोही काम आता है।१। हे भाई! संत जन परमात्मा के नाम में मस्त हो कर, बयंत प्रभु के प्रेम में जुड़ के, इक निरंकार के गुण गाते रहते है। रहाउ। हे भाई! बहुत निम्र-सवभाव संत की सोभा (का मूल) है, परमात्मा की सिफत-सलाह करनी ही संत की प्रशंसा ( का कारण) है। परमात्मा की भगती संत जानो की हृदय में आनंद पैदा करती है। (भक्ति की बरकत से) संत जनों के हृदय में सुख बना रहता है (उनके अंदर की) चिंता नास हो जाती है।२।