Hukamnama 17 June 2020, हुक्मनामा श्री हरिमंदिर साह

हुक्मनामा श्री हरिमंदिर साहिब जी 17 जून

सूही महला १ ॥ जिन कउ भांडै भाउ तिना सवारसी ॥ सूखी करै पसाउ दूख विसारसी ॥ सहसा मूले नाहि सरपर तारसी ॥१॥ तिन्हा मिलिआ गुरु आइ जिन कउ लीखिआ ॥ अम्रितु हरि का नाउ देवै दीखिआ ॥ चालहि सतिगुर भाइ भवहि न भीखिआ ॥२॥

(प्रभु) जिन (जीवों) को (हिर्दय रूप) बर्तन में प्रेम (की भिक्षा देता है), (उस प्रेम की बरकत से प्रभु) उनका जीवन सुंदर बना देता है। उनके उपर सुखो की बक्शीश कर देता है, उनका दुःख भुला देता है। इस बात मैं जरा भी शक नहीं है की ऐसे जीवों को प्रभु जरूर (संसार समुन्दर से पार) कर देता है। जिन जीवों को (दरगाह लिखी बक्शीश का) लेख मिल जाता हिया, उनको गुरु आ के मिलता है। गुरु उनको परमात्मा का आत्मिक जीवन देने वाला नाम शिक्षा के तौर पर देता है, वेह मनुख (जीवन सफ़र में) गुरु के बताये अनुसार चलते हैं, और (इधर उधर ) नहीं भटकते।२।