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Hukamnama

हुक्मनामा श्री हरमंदिर साहिब जी 16 फरवरी

धनासरी महला ५ ॥ जतन करै मानुख डहकावै ओहु अंतरजामी जानै ॥ पाप करे करि मूकरि पावै भेख करै निरबानै ॥१॥ जानत दूरि तुमहि प्रभ नेरि ॥ उत ताकै उत ते उत पेखै आवै लोभी फेरि ॥ रहाउ ॥

हे भाई! (लालची मनुख) अनको जातां करता है, लोगो को धोखा देता है, झूठे धार्मिक पहरावे बनाई रखता है, पाप करके (फिर उनसे मुकर जाता है) परन्तु सब के दिलों की जानने वाला प्रभु (सब कुछ) जनता है।१। हे प्रभु! तुम(सब जीवों के) नजदीक बसते हो, परन्तु (लालची पाखंडी मनुख) तुझे दूर (बस्ता) समझता है। लालची मनुख (लालच के चक्कर ) में फसा रहता है, (माया की खातिर) इधर उधर देखता है, उधर से उधर देखता है (उसका मन टिकता नहीं) ।रहाउ