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Hukamnama

हुक्मनामा श्री हरमंदिर साहिब जी 12 फरवरी

सलोकु मः ४ ॥ अंतरि अगिआनु भई मति मधिम सतिगुर की परतीति नाही ॥ अंदरि कपटु सभु कपटो करि जाणै कपटे खपहि खपाही ॥ सतिगुर का भाणा चिति न आवै आपणै सुआइ फिराही ॥ किरपा करे जे आपणी ता नानक सबदि समाही ॥१॥

(मनमुख के) हिरदय में अज्ञान है, (उस की) अकल (मति) नादान होती है और सतगुरु ऊपर उस को सिदक नहीं होता; मन में धोखा (होने के कारन संसार में भी) वेह सारा धोखा ही धोखा समझता है। (मनमुख मनुख खुद) दुःख होते हैं ( व् औरों को) दुखी करते हैं; सतगुरु का हुकम उनके मन में नहीं आता (भाव, रजा नहीं मानते) और अपनी गरज के पीछे भटकते रहते हैं; हे नानक! अगर हरी अपनी मेहर करे, तो ही वेह गुरु के शब्द में लीं होते हैं।१।