Hukamnama

हुक्मनामा श्री हरमंदिर साहिब जी 25 जनवरी

वडहंसु महला ३ ॥
सुणिअहु कंत महेलीहो पिरु सेविहु सबदि वीचारि ॥ अवगणवंती पिरु न जाणई मुठी रोवै कंत विसारि ॥ रोवै कंत समालि सदा गुण सारि ना पिरु मरै न जाए ॥ गुरमुखि जाता सबदि पछाता साचै प्रेमि समाए ॥ जिनि अपणा पिरु नही जाता करम बिधाता कूड़ि मुठी कूड़िआरे ॥ सुणिअहु कंत महेलीहो पिरु सेविहु सबदि वीचारे ॥१॥

हे प्रभु-पति की जिव-स्त्रिओ! (मेरी बात) सुनो और गुरु के शब्द के द्वारा प्रभु के गुणों का विचार कर के प्रभु -पति की सेवा-भक्ति करा करो! अवगुणों से भरी हुई जिव-स्त्री प्रभु पति से गहरी साँझ नहीं बनाती और प्रभु-पति को भुला के वह आत्मिक जीवन लुटा बैठती हैं और दुखी होती हैं। परन्तु जो जिव-स्त्री पति को हृदय में बसा कर प्रभु के गुण सदा याद कर कर के (प्रभु के दर पर सदा) अरदास करती रहती है, उस का खसम (-प्रभु) कभी मरता नहीं, उस को कभी छोड़ के नहीं जाता। जिस ने गुरु की सरन आ के शब्द के द्वारा प्रभु से जान पहचान कर ली वह सदा कायम रहने वाले प्रभु के प्रेम में लीन रहती है। जिस जिव-इस्त्री ने अपने उस प्रभु-पति से साँझ नहीं बनाई जो सब जीवों को उनके कर्मो के अनुसार पैदा करने वाला है, उस कुड़ की बंजारन को माया का मोह ठगता रहता है।