Hukamnama

हुक्मनामा श्री हरिमंदिर साहिब जी 29 मई

धनासरी महला १ घरु २ असटपदीआ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ गुरु सागरु रतनी भरपूरे ॥ अम्रितु संत चुगहि नही दूरे ॥ हरि रसु चोग चुगहि प्रभ भावै ॥ सरवर महि हंसु प्रानपति पावै ॥१॥ किआ बगु बपुड़ा छपड़ी नाइ ॥ कीचड़ि डूबै मैलु न जाइ ॥१॥ रहाउ ॥

राग धनासरी, घर २ में गुरु नानक देव जी की आठ-बंदो वाली बाणी। अकाल पुरख एक है और सतगुरु की कृपा द्वारा मिलता है। गुरु (मानो) एक सागर (है जो प्रभु की सिफत सलाह के) रत्नों से लाबा-लब भरा हुआ है। गुरमुख सिख (उस सागर में) आत्मिक जीवन देने वाली खुराक (प्राप्त करते हैं जैसे हंस मोती) चुगते हैं, (और गुरु से) दूर नहीं रहते। प्रभु की कृपा अनुसार संत-हंस हरी-नाम रस (की) चोग चुगते हैं। (गुरसिख) हंस (गुरु-) सरोवर में (टिके रहते हैं, और) जिंद के मालिक प्रभु को ढूंढ़ लेते हैं।१। बेचारा बगुला तालाब में किस लिए नहाता है? (कुछ नहीं कमाता, बलिकी, तालाब में नहा कर) कीचड़ में डूबता है, (उस की यह) मैल दूर नहीं होती (जो मनुख गुरु-सागर को छोड़ कर देवी देवता आदि और और सहारे खोजते हैं वह, मानो तालाब में ही नहा रहे हैं। वहाँ वह और माया-मोह की मैल खिंच लेते हैं।१।रहाउ।

वाहेगुरु जी का खालसा!!
वाहेगुरु जी की फ़तेह!!