Hukamnama, हुक्मनामा श्री हरिमंदिर साहिब जी

हुक्मनामा श्री हरिमंदिर साहिब जी 7 अप्रैल

सोरठि महला १ ॥ जिन्ही सतिगुरु सेविआ पिआरे तिन्ह के साथ तरे ॥ तिन्हा ठाक न पाईऐ पिआरे अम्रित रसन हरे ॥ बूडे भारे भै बिना पिआरे तारे नदरि करे ॥१॥ भी तूहै सालाहणा पिआरे भी तेरी सालाह ॥ विणु बोहिथ भै डुबीऐ पिआरे कंधी पाइ कहाह ॥१॥ रहाउ ॥

जिन लोगो ने सतगुरु का पल्ला पकड़ा है, हे सजन! उनके संगी साथी भी पार निकल जाते है। जिन की जिव्हा परमात्मा का नाम-अमृत चक्थी है उनके (जीवन सफ़र मैं विकार आदि की)रूकावट नहीं रहती। हे सजन! जो मनुख परमात्मा के डर अदब से दूर रहते हैं वेह विकारों के भार से दब जातें हैं और संसार समुन्दर मे डूब जातें hain। परन्तु जब परमात्मा मेहर की नज़र करता हैं तो उनको भी पार लगा लेता है।१। हे सज्जन-प्रभु! सदा तुझे ही सलाहना चाहिये, सदा तेरी ही सिफत-सलाह करनी चाहिये। (इस संसार-सागर से पार निकलने के लिए तेरी सिफत-सलाह जीवों के लिए जहाज है, (इस) जहाज के बिना भाव-सागर में डूब जाते हैं। (कोई भी जिव समुन्द्र का) दूसरा किनारा नहीं पा सकता।रहाउ।