20 april 2020 hukamnama

हुक्मनामा श्री हरिमंदिर साहिब जी 20 अप्रैल

लाज मरंती मरि गई घूघटु खोलि चली ॥ सासु दिवानी बावरी सिर ते संक टली ॥ प्रेमि बुलाई रली सिउ मन महि सबदु अनंदु ॥ लालि रती लाली भई गुरमुखि भई निचिंदु ॥१२॥ लाहा नामु रतनु जपि सारु ॥ लबु लोभु बुरा अहंकारु ॥ लाड़ी चाड़ी लाइतबारु ॥ मनमुखु अंधा मुगधु गवारु ॥ लाहे कारणि आइआ जगि ॥ होइ मजूरु गइआ ठगाइ ठगि ॥ लाहा नामु पूंजी वेसाहु ॥ नानक सची पति सचा पातिसाहु ॥१३॥

हे पांडे! (गुरु की शरण आने वाली जीव स्त्री की) दुनिया से शर्म रखने वाली पहली अकल खत्म हो जाती है, और वह लोग लाज का घूंघट उतार कर चलती है। (जिस माया ने उसको पति प्रभु में जुड़ने से रोका हुआ था, उस) मूर्ख मायाका डर उसके सिर से हट जाता है। उसको प्रति प्यार के साथ बुलाता है (भाव अर्थ अपनी याद की ललक देता है) उसके मन में सतगुरु का शब्द अवस्था है उसके मन में आनंद टिका रहता है। जो जी स्त्री प्रभु की शरण आती है उसको दुनिया वाली कोई चिंता सता नहीं सकती। प्रीतम पति के प्रेम में रंगी हुई के मुख पर लाली नजर आती है । 12 ।
(हे पांडे!) परमात्मा का सर्वश्रेष्ठ नाम जपा कर सर्वश्रेष्ठ नाम ही असली कमाई है। जिव्हा का चस्का, माया का लालच, अहंकार एक बुरा कर्म है। निंदा , खुशामद, चुगली यह हर एक कर्म बुरा है। जो मनुष्य परमात्मा की शरण छोड़ कर अपने मन के पीछे चलता है और लोग अधिक करता है वह मूर्ख और अंधा है। ,(भाव और उसको जीवन का सही मार्ग नहीं दिखता) जीव जगत में कुछ कमाने की खातिर आता है परंतु माया का गोला बनकर मुंह के हाथ जीवन खेल हार जाता है। जो मनोज श्रद्धा को अपनी पूंजी बनाता है और इस पूंजी के द्वारा परमात्मा का नाम कमाता है यह नानक उसको सदा रहने वाला परमात्मा सदा रहने वाली इज्जत रखता है। 13।