rakesh Tikait, mamata banerjee

टिकैत जी बताइए, ममताजी से मिलने का आपका इरादा क्या था

चंडीगढ़: आम जनता के मन में ऐसे सवाल उठ ही रहे थे, कहीं राजनीतिक पार्टियां किसानों के कंधे का इस्तेमाल तो नहीं कर रही हैं? नए कृषि कानूनों के विरुद्ध आंदोलन कर रहे किसान नेता राकेश टिकैत की कोलकाता यात्र ने इस धारणा पर मानो मोहर लगा दी। वह पहले चुनाव में भाजपा का विरोध करने गए थे और अब फिर पहुंच गए। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से मिले। बातचीत किसान आंदोलन तेज करने पर थी।

हो सकता है टिकैत की कोलकाता यात्र पहली नजर में कोई नई बात न लगे। जनवरी में केंद्र के साथ बातचीत बंद होने के बाद वह विधानसभा चुनावों में अपने साथियों के साथ बंगाल गए, खास तौर पर नंदीग्राम, जहां से ममता बनर्जी अपनी जिंदगी की सबसे कठिन सियासी जंग लड़ रही थीं। टिकैत ने कहा था, हम भाजपा को हराना चाहते हैं, जीते चाहे कोई। यह अलग बात है कि ममता दीदी हार गई और भाजपा के शुभेंदु अधिकारी जीत गए। टिकैत की अपील नंदीग्राम में बेअसर हो गई।

अब टिकैत का दुबारा ममता बनर्जी की शरण में जाना कई प्रकार से चौंकाता है। यह व्यक्तिगत मुलाकात भी नहीं थी। वह अपने संगठन भारतीय किसान यूनियन (टिकैत) के महासचिव युद्धवीर सिंह को साथ लेकर गए। ममता के साथ उनकी पार्टी में नए-नए आए पूर्व केंद्रीय मंत्री यशवंत सिन्हा भी बैठे, जो कई साल तक मोदी सरकार का विरोध कर भाजपा जनता पार्टी छोड़ चुके हैं। आखिर इस मुलाकात के अर्थ क्या हैं? प्रैसवार्ता में ममता बनर्जी ने कहा, मुझसे किसान आंदोलन तेज करने के संबंध में समर्थन मांगा गया है कि मैं गैर-भाजपा मुख्यमंत्रियों से बात करूं। नए कृषि कानूनों के बारे में उनका एक वचरुअल सम्मेलन बुलाऊं और फिर कानून रद्द करने के लिए संयुक्त वक्तव्य जारी कराऊं। मैं अपने मित्र मुख्यमंत्रियों से इस बारे में जरूर बात करूंगी।

ये नया सम्मेलन चाहे जब हो मगर एक बात साफ है। अब किसानों के कंधों पर बंदूक रखकर एक नई सियासत को जन्म देने की कोशिश हो रही है। यह कोरी राजनीति नहीं तो और क्या है? राकेश टिकैत को यह बताना चाहिए कि वह किसान नेता हैं या राजनीतिक नेता। क्या वे तृणमूल कांग्रेस में शामिल होना चाहते हैं। या किसी और दल में। या अपनी राजनैतिक पार्टी बनाकर यूपी चुनावों में कोई गुल खिलाना चाहते हैं। वे पहले भी विधानसभा चुनाव लड़ चुके हैं। जीते नहीं थे।

ऐसे में किसानों के सामने एक सोचनीय बात यह भी है कि केंद्र पिछले छह माह से जारी किसान आंदोलन के बावजूद इन कानूनों को रद्द करने के लिए तैयार नहीं है। हां, बातचीत कर संशोधन के लिए हरदम तैयार है। आज जरूरत यह है कि आम किसान इस सियासत को समङों और इसके जाल में फंसने से बचें। पब्लिक तो सब जानती ही है। सीधा रास्ता तो यह है कि 11 या 21 किसान नेता अपनी कमेटी बनाएं और केंद्र के साथ बैठकर अपनी पसंद के बदलाव कानूनों में करवाएं। ऐसा हो नहीं रहा। इसलिए किसान समझने लगे हैं कि उन्हें धरनों पर बैठाकर उनके कुछ नेता आंदोलन को अपने निजी फायदे का मंच बना रहे हैं। ये जो भोले-भाले लोग आपने धूप-बारिश में सड़क पर बैठाए हैं, उन्हें भी आहिस्ता-आहिस्ता पता लग रहा है कि ये सब राजनैतिक लोगों की साजिश है और उन्हें भ्रम में डालकर कुछ लोग अपनी लीडरी चमका रहे हैं।

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