G 7 foreign ministers

जी-7 विदेश मंत्रियों के बयान ने किया चीन को बदनाम

एनपीसी में हांगकांग विशेष प्रशासनिक क्षेत्र की चुनाव प्रणाली को परिपूर्ण बनाने का निर्णय पारित होने के बाद 12 मार्च के जी-7 के विदेश मंत्रियों ने तथाकथित बयान जारी कर लोकतंत्र का झंडा उठाकर चीन को बदनाम किया। जिसमें कहा गया है कि चीन ने हांगकांग के उच्च स्वशासन को बर्बाद किया और चीन से चीन-ब्रिटेन संयुक्त वक्तव्य के मुताबिक कार्रवाई करने की अनुचित मांग की।

इतिहास का सिंहावलोकन करते हुए देखा जा सकता है कि ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के तहत हांगकांग में लोगों को सड़क पर जाकर प्रदर्शन करने का हक भी नहीं था। चीन की गोद में वापस लौटने के बाद हांगकांग वासी सही माइने में अभूतपूर्व लोकतांत्रिक अधिकारों और स्वतंत्रता का उपभोग कर पाए।

उल्लेखनीय बात यह है कि एक देश दो व्यस्थाओं का उसूल पेश करने का मकसद देश के एकीकरण और प्रादेशिक भूमि की अखंडता की रक्षा करना है। यानी एक देश दो व्यवस्थाओं की पूर्व शर्त और आधार है। चीन की केंद्र सरकार संविधान और हांगकांग के बुनियादी कानून के मुताबिक हांगकांग का प्रशासन करती है। जबकि हांगकांग को केंद्र सरकार के नेतृत्व में उच्च स्वशासन का अधिकार है।

इस बार जी-7 के विदेश मंत्रियों ने हांगकांग की चुनाव प्रणाली को बदनाम कर इसके सुधार को आम चुनाव से जोड़ने की कुचेष्टा की, जो बिलकुल निराधार है। उन्होंने फिर एक बार चीन-ब्रिटेन संयुक्त वक्तव्य की चर्चा की। लेकिन चीन-ब्रिटेन संयुक्त वक्तव्य में ब्रिटेन को हांगकांग की वापसी के बाद हांगकांग में कोई कर्तव्य निभाने या हांगकांग के मामलों में हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं दिया गया है।

हांगकांग की वापसी के बाद ब्रिटेन को हांगकांग की निगरानी करने और प्रशासन करने का कोई हक नहीं है। और तो और यह संयुक्त वक्तव्य एक द्विपक्षीय दस्तावेज है। अन्य देशों और संगठनों को इसके सहारे हांगकांग के मामले में हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं है। जी-7 के विदेश मंत्रियों की इस कार्रवाई ने अंतर्राष्ट्रीय कानून और अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के बुनियादी नियमों का उल्लंघन किया है। जिससे चीन के विकास को रोकने के लिए औपनिवेशिक मानसिकता और भयावह इरादे जाहिर होते हैं। 
(साभार- चाइना मीडिया ग्रुप, पेइचिंग)


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