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वृंदावन में शुरू हुई जन्माष्टमी पर्व की तैयारियां, जानिए कैसे हुई इस परंपरा की शुरुआत

मथुराः राधारानी की नगरी वृंदावन में जन्माष्टमी की तैयारियां अभी से शुरु हो गई हैं। राधारमण, राधा दामोदर एवं शाह मंदिर में ठाकुर के अभिषेक के बाद चरणामृत का वितरण भक्तों में होता है। यही कारण है कि इस आयोजन में कई मन गाय के दूध की आवश्यकता होती है। राधारमण मंदिर में तो 27 मन दूध दही की जरुरत होती है। इसलिए मंदिर सेवायत और कर्मचारी जिले के विभिन्न भागों में जाकर आवश्यकता से अधिक दूध की एक प्रकार से एडवांस बुकिंग कर रहे हैं। कुछ दूध एक दिन पहले खरीदकर उसका दही जमा दिया जाता है। इन मंदिरों में अभिषेक में भी गाय के घी का ही प्रयोग होता है, इसलिए सामग्री के इकट्ठा करने एवं ठाकुर के आभूषणों को साफ करने का काम अभी से शुरु हो गया है।

राधारमण मंदिर के सेवायत आचार्य दिनेश चंद्र गोस्वामी ने बताया कि श्रीकृष्ण जन्माष्टमी एक प्रकार से श्यामसुंदर की सालगिरह का दिन है। श्रीकृष्ण का अवतरण तो आज से लगभग सवा 5 हजार वर्ष पहले ही हो गया था। इस परंपरा की शुरुआत गोपाल भट्ट गोस्वामी ने की थी, जिनकी भक्ति से प्रसन्न होकर ठाकुर उनके गंडगी नदी में स्नान करते समय स्वयं प्रकट हुए थे। जिस प्रकार बच्चे की सालगिरह पर उसे अच्छे से अच्छे कपड़े पहनाए जाते हैं, उसी प्रकार श्रीकृष्ण जन्म पर मंदिर को सजाने और नाना प्रकार के व्यंजन का भोग लगाने की परंपरा सैकड़ों साल से चली आ रही है।

दिनेश चंद्र गोस्वामी के अनुसार श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर सबसे पहले अभिषेक में भाग लेने वाले गोस्वामी संकीर्तन के मध्य यमुना जल लेकर आते हैं और पट खुलते ही अभिषेक शुरु हो जाता है। सबसे पहले ठाकुर का यमुना जल से अभिषेक करते हैं। इसके बाद 27 मन दूध, दही, घी, बूरा, शहद, औषधियों, सर्वोषधियों, महौषधियों, फूल फल एवं अष्ट कलश से 3 घंटे से अधिक समय तक घड़ियाल और शंखध्वनि के मध्य अभिषेक होता है।

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