Afghan people

अफ़ग़ानिस्तान का भविष्य केवल अफ़ग़ान लोग ही तय कर सकेंगे

अफगानिस्तान के हालिया हालात ने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा है। वास्तव में, 1960 के दशक में वियतनाम युद्ध के बाद अमेरिका ने पहली बार सैनिक वापसी की है। हालाँकि, अफगान लोगों का दुख समाप्त नहीं हुआ। आतंकवाद के खिलाफ 20 साल के युद्ध में दो मिलियन से अधिक नागरिकों को मार डाला गया, बुनियादी ढांचे में गड़बड़ी हुई और लोगों का जीवन स्तर सबसे नीचे तक गिर पड़ा। इस देश का भविष्य बिल्कुल चिंताजनक है।
 
अफगानिस्तान के बारे में जब बात करते हैं, तब हमें यह समझना चाहिए कि इस देश की आबादी लगभग 39 मिलियन है, न कि केवल राजधानी काबुल समेत कुछ बड़े शहर। उधर पश्चिमी मीडिया ने अफगान बुद्धिजीवियों और महिला एथलीटों आदि के अनिश्चित भाग्य का प्रचार किया और उनका सनसनी पैदा करने के लिए इस्तेमाल किया। लेकिन अफगानिस्तान में लाखों लोगों, जिन्हें अपनी बुनियादी जरूरतों को बनाए रखने की सख्त जरूरत है, की उपेक्षा की गयी। संबंधित संयुक्त राष्ट्र संगठनों की रिपोर्टों के अनुसार, पिछले 20 वर्षों में युद्ध के कारण अफगानिस्तान में एक तिहाई स्कूली बच्चे स्कूल छोड़ चुके हैं, 2.7 मिलियन लोग विदेश भाग गए हैं, और 4 मिलियन से अधिक लोग बेघर हो गए हैं। 
  
दूसरी ओर, पश्चिमी मीडिया ने अफगानिस्तान पर अमेरिकी कब्जे को "लोकतंत्र और सभ्यता का विस्तार" के रूप में वर्णित किया और अफगानिस्तान को अमेरिकी सेना की वापसी के बाद के खंडहर के रूप में वर्णित किया। दरअसल, सीजीटीएन की रिपोर्ट के मुताबिक तालिबान के आने के बाद भी काबुल में लोगों की जिंदगी चलती रही। बेशक, स्थिति बदलने के बाद नागरिक अपने जीवन के बारे में थोड़ा चिंतित हैं, खासकर कीमतों और दैनिक आवश्यकताओं की आपूर्ति पर। लेकिन सामान्य जीवन का रखरखाव भी पूरी तरह से एक स्थिर सामाजिक व्यवस्था पर निर्भर है।पाकिस्तान-अफगानिस्तान सीमा से प्राप्त खबरों के अनुसार वहां लाखों अफगान शरणार्थी नहीं हैं, और यह भी कहा जा सकता है कि मूल रूप से बहुत से शरणार्थी नहीं हैं। स्थानीय लोगों ने तो यहां तक कहा कि वह समय जब सबसे ज्यादा शरणार्थी थे, जब 20 साल पहले अमेरिकी सेना ने अफगानिस्तान पर हमला किया था। अधिकांश अफ़गानों के लिए, अमेरिकी सेना की वापसी के कारण युद्ध को समाप्त करने और नए जीवन शुरू होने की आशा नजर आयी है। 
  
आतंकवाद विरोधी यही कारण है कि अमेरिका ने अफगानिस्तान में युद्ध बनाया। हालांकि अमेरिका का इस देश पर कब्जा लेने के 20 साल बाद भी अफगानिस्तान में आतंकी खतरा जस का तस बना हुआ है। अमेरिका ने अफगानिस्तान को एक और इराक में बदलना चाहा, जहां उसने पश्चिमी प्रणाली और अमेरिकी समर्थक शासन स्थापित किया। इसका गहरा रणनीतिक उद्देश्य आसपास देशों को धमकी देने के लिए एक मध्य एशियाई गढ़ स्थापित करना था। इसके लिए अमेरिका और उसके सहयोगियों ने वास्तव में कुछ धन का निवेश किया है। हालांकि, 20 साल बाद अमेरिका ने पाया कि वह पैसे खर्च करने के अलावा अफगानिस्तान में कोई रणनीतिक लक्ष्य हासिल नहीं कर सका। इसलिए अमेरिका ने इस बोझ को छोड़ने का फैसला किया। 

अमेरिका तथाकथित लोकतांत्रिक व्यवस्था और महाशक्ति की ताकत के बारे में अंधविश्वासी है, लेकिन यह नहीं जानता कि अफगानिस्तान, जिसे साम्राज्य के मकबरे के रूप में जाना जाता है, अंततः इसे वियतनाम युद्ध के बाद सबसे बड़ा अपमान लेकर आया। तथ्यों ने साबित कर दिया है कि पश्चिमी राजनीतिक मॉडल मानव जाति की अपरिहार्य प्रणाली नहीं है। एक प्रणाली जो पश्चिम में चल सकती है, वह अन्य देशों में नहीं चल सकती है। अफगानिस्तान की धार्मिक सभ्यता पश्चिम के लोकतंत्र के साथ पूरी तरह से असंगत है। अंत में अमेरिका 20 वर्षों और 28 खरब अमेरिकी डॉलर की लागत से अफगान युद्ध हार गया, और साथ ही साथ इस देश को बर्बाद कर दिया। यहां तक कि फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों ने भी बताया कि अफगानिस्तान की स्थिति दर्शाती है कि लोकतंत्र को बाहर से बलपूर्वक थोपा नहीं जा सकता।   

तालिबान ने एक नई सरकार की स्थापना की घोषणा की है, और उसके प्रवक्ता ने यह स्पष्ट किया कि अफगानिस्तान पश्चिमी लोकतंत्र नहीं अपनागा, पर इस्लामी कानून के अनुसार देश पर शासन करेगा। दरअसल, सऊदी अरब और ईरान जैसे कई देश हैं जो पश्चिमी व्यवस्था से अलग हैं लेकिन फिर भी दुनिया के साथ शांतिपूर्वक रह सकते हैं। अफगानिस्तान को पश्चिमी मॉडल को स्वीकार करने के लिए मजबूर करना यथार्थवादी नहीं है।अफगानिस्तान के लिए, सबसे जरूरी लक्ष्य शांति और सुलह को जल्दी से हासिल करना और लोगों की आजीविका में सुधार करना है। अफगानिस्तान में कई धार्मिक संप्रदाय हैं और जातीय संरचना जटिल है। कुछ बड़े शहरों को छोड़कर अधिकांश निवासी अभी भी "पारंपरिक जीवन युग" में रह रहे हैं।इसलिए तालिबान को बहुसंख्यक लोगों का समर्थन आसानी से मिल सकता है।

हालाँकि तालिबान सहित सभी गुटों को यह समझना चाहिए कि अफगानिस्तान को भी बदलाव करना पड़ेगा। चरमपंथी शासन किसी के लिए भी अच्छा नहीं है, और आतंकवादी संगठनों के साथ सहयोग करने से उसे बड़ी आपदाएँ लाएगा। तालिबान को उदार और समावेशी नीतियों को अपनाना चाहिए, सक्रिय रूप से अपनी छवि को सुधारना चाहिए और अफगानिस्तान को सभी पक्षों के लिए स्वीकार्य देश बनाने का प्रयास करना चाहिए। और यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण है कि तालिबान को "अल-कायदा" संगठन सहित सभी आतंकवादी संगठनों के साथ संबंधों को स्पष्ट रूप से काट देना चाहिए, और शासन की हानिरहितता को हासिल करना चाहिए। अन्यथा, अफगानिस्तान में शांति अंततः हासिल करना मुश्किल होगा।
(साभार----चाइना मीडिया ग्रुप ,पेइचिंग)

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