Navjot Singh Sidhu

Navjot Singh Sidhu 'राजनीतिक कलाबाजी' में धुरंधर हो चुके हैं, जानने के लिए पढ़ें!

पंजाब : कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू ने आज अचानक अपने पद से इस्तीफा दे दिया। कांग्रेस नेतृत्व ने पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह को काफी मायूस करके उन्हें यह जिम्मेदारी सौंपी थी, लेकिन वह 72 दिन से ज्यादा इस पद पर भी नहीं टिक पाए, जबकि प्रदेश में पार्टी उसी रास्ते चलती दिखी जिस पर सिद्धू ने उसे चलाने की कोशिश की है। सिद्धू को भरोसे में लेने के बाद ही चरणजीत सिंह चन्नी को पंजाब विधानसभा चुनाव से कुछ महीने पहले वहां का ताज दिया गया। मंत्री-उपमुख्यमंत्री बनाने में भी सिद्धू की ही चलती रही, लेकिन सिद्धू ने अचानक पार्टी चीफ का पद छोड़कर कांग्रेस आलकमान को फिर से नए संकट में डाल दिया है। अब न तो उनके पास अमरिंदर हैं और न ही सिद्धू वह जिम्मेदारी निभाने को तैयार हैं। सिद्धू का राजनीतिक करियर लगभग 17 साल का हो चुका है। भाजपा ने 2004 में पहली बार उन्हें लोकसभा चुनाव में अमृतसर सीट से टिकट दिया और वह चुनाव जीत गए, 2006 में उन्हें 1988 के रोड रेज केस में दोषी करार दिए जाने की वजह से लोकसभा की सदस्यता छोड़नी पड़ गई, 2007 में हुए उपचुनाव में उन्होंने भाजपा के टिकट पर यह सीट दोबारा जीत ली, 2009 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने लगातार तीसरी बार अमृतसर सीट से जीत दर्ज की। भाजपा से उनकी पहली मायूसी तब शुरू हुई, जब उन्हें दिग्गज नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण जेटली के लिए 2014 के लोकसभा चुनाव में यह सीट छोड़नी पड़ी। 

भाजपा ने 2 साल के इंतजार के बाद सिद्धू को राज्यसभा में भेज दिया, लेकिन शायद तब तक बहुत देर हो चुकी थी और सिद्धू भीतर ही भीतर पार्टी से दूरी बना चुके थे। वह एक साल भी राज्यसभा के सदस्य बनकर नहीं रहे और उससे इस्तीफा दे दिया। वैसे भी शिअद के बादल परिवार को तबज्जो देने से वह अपनी पार्टी से कभी खुश नहीं रहे, लेकिन एन.डी.ए. का गठबंधन धर्म निभाने के चक्कर में पार्टी ने सिद्धू की दलीलों को हमेशा ही अनसुना किया था। भाजपा से जब उन्होंने नाता तोड़ लिया तब अटकलें शुरू हुईं कि वह 2017 के विधानसभा चुनाव में अरविंद केजरीवाल की 'आप' का सियासी मोहरा बन सकते हैं, लेकिन उस साल चुनाव से पहले सिद्धू आश्चर्यजनक रूप से कांग्रेस में शामिल हो गए। इस दौरान कांग्रेस ने 2017 का विधानसभा चुनाव कैप्टन का नेतृत्व बादल-भाजपा सरकार के खिलाफ जनता का आक्रोश और बॉलीवुड की फिल्म 'उड़ता पंजाब' से बनाए गए माहौल की वजह से भारी बहुमत से जीत लिया। कैप्टन कांग्रेस सरकार के कप्तान बने और सिद्धू को पर्यटन और स्थानीय निकाय जैसे विभागों का मंत्री बनाया गया। सिद्धू को कांग्रेस में लाने का श्रेय राहुल गांधी और उनकी बहन प्रियंका गांधी वाड्रा का था, इसलिए मुख्यमंत्री की कुर्सी पर उनकी आस लगातार कायम रही। यही वजह है कि गांधी परिवार के लिए अपनी राजनीति को सियासी दांव पर लगाने में भी सिद्धू पीछे नहीं रहे। 2019 में जब लोकसभा चुनाव से पहले अमेठी में राहुल गांधी की हालत पतली होने का दावा किया जा रहा था तो सिद्धू ने यहां तक ताल ठोक दिया कि अगर राहुल गांधी अमेठी में हार जाएंगे तो वह राजनीति छोड़ देंगे। उन्होंने राजनीति तो नहीं छोड़ी, लेकिन काफी दिनों तक मीडिया में बोलना जरूर बंद कर दिया।

इस दौरान कैप्टन ने सिद्धू पर कई गंभीर आरोप लगाए और चुनावों में भी हर हाल में उन्हें हराने का ऐलान कर दिया। शायद इसका परिणाम यह हुआ कि सिद्धू मुख्यमंत्री बनते-बनते रह गए और कांग्रेस चरणजीत सिंह चन्नी को ढूंढ़कर ले आई। मंत्रिपरिषद के गठन में भी सिद्धू की अहम भूमिका रही और शपथ ग्रहण में मंच पर वह 'सुपर' भूमिका में नजर आए, लेकिन 2 दिन बाद ही उन्होंने प्रदेश अध्यक्ष पद से भी इस्तीफा दे दिया। करीब डेढ़ दशक की राजनीति में सिद्धू इतनी कलाबाजियां खा चुके हैं कि वह आगे क्या करने वाले हैं, शायद उन्हीं को पता होगा, इसलिए अमरिंदर के लिए वह भले ही 'अस्थिर' हों, लेकिन खुद को किसी 'धुरंधर' से कम नहीं समझ रहे होंगे। इस दौरान नवजोत सिद्धू पंजाब में अपनी पार्टी की सरकार और मुख्यमंत्री पर विपक्षी नेताओं से भी बढ़कर हमला करना शुरू कर दिया। समझ पाना मुश्किल था कि सिद्धू खुद ऐसा कर रहे थे कि उनसे अमरिंदर की फजीहत करवाने के लिए ऐसा करने को कहा जा रहा था। इस दौरान 2 साल तक पंजाब कांग्रेस और उसकी सरकार इसी अंतर-विरोध को झेलने को मजबूर रही, फिर चर्चा शुरू हुई सिद्धू को प्रदेश अध्यक्ष बनाने की। अमरिंदर इसके मुखर विरोधी थे, लेकिन गांधी परिवार की नजदीकियों के चलते इस साल जुलाई में उन्हें पार्टी ने प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त कर दिया। सिद्धू ने यह जिम्मेदारी संभालने के लिए जितना तामझाम किया, उतना कांग्रेस की राजनीति में शायद ही कभी देखा गया है।


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