Lord Shiva

समुद्र मंथन से निकले कालकूट विष के बारे में जानिए कुछ रोचक बातें

देवों के देव महादेव ने हर किसी पर अपनी कृपा दृष्टि बरसाई है, फिर चाहे वो इंसान हो या कोई असुर। भगवान शिव ने खुद विष भी पी लिया था। आप सभी ये तो जानते होंगे के क्षीरसागर में देवता और दैत्यों के मिलकर मदरांचल पर्तत को मथनी और वासुकी नाग को रस्सी बनाकर समुद्र मंथन किया था। समुन्द्र मंथन करते वक्त 14 तरह के रत्न मंथन से प्राप्त हुए थे। जिसमें से पहला था कालकूट नामक विष। 

इस विष को स्वयं भगवान शिव ने पी लिया और अपने गले से निचे उतरने नहीं दिया था।  जिसके बाद से भगवान शिव को नीलकंठ नाम से भी जाना जाने लगा। 14 तरह के रत्न मंथन से अंत में अमृत निकला था जिसके चलते देव और दैत्यों में झगड़ा हुआ था। लेकिन क्या आप जानते हैं के जब पहली चीज यानी के कालकूट विष निकला क्या था और कैसा था? आज हम आपको इस ही सवाल का जवाब देने जा रहे हैं, तो चलिए जानते हैं कालकूट विष के बारे में -

1. मंथन के दौरान निकले विष कालकूट को हलाहल भी कहा जाता है।

2. इसे न तो देवता ग्रहण करना चाहते थे और न ही असुर।

3. यह विष इतना खतरनाक था, जो संपूर्ण ब्रह्मांड का विनाश कर सकता था।

4. इस विष को ग्रहण करने के लिए स्वयं भगवान शिव आए।

5. शिव जी ने विष का प्याला पी लिया लेकिन तभी माता पार्वती, जो उनके साथ खड़ी थीं उन्होंने उनके गले को पकड़ लिया।

6. ऐसे में न तो विष उनके गले से बाहर निकला और न ही शरीर के अंदर गया। वह उनके गले में ही अटक गया जिसकी वजह से उनका गला नीला पड़ गया और वे नीलकंठ कहलाए।

7. इसे काला बच्छनाग भी कहते हैं।

Live TV

Breaking News


Loading ...