Kalashtami

जानिए कालाष्टमी व्रत कथा के बारे में

कालाष्टमी व्रत कथा 
पौराणकि कथाओं में कालाष्टमी की व्रत कथा मिलती है कि एक बार भगवान विष्णु और ब्रह्मा जी के बीच विवाद छिड़ गया कि श्रेष्ठ कौन है। यह विवाद इतना अधिक बढ़ गया कि सभी देव गण घबरा गए की अब प्रलय होने वाली है और सभी देव भगवन शिव के पास चले गए और समाधान ढूंढने लग गए। तब भगवान शिव ने एक सभा का आयोजन किया और इस सभा में सभी ज्ञानी, ऋ षि-मुनि, सद्ध संत आदि उपस्थित किए और साथ में विष्णु व ब्रह्मा जी को भी आमंत्रित किया। सभा में लिए गए एक निर्णय को भगवान विष्णु तो स्वीकार कर लेते हैं, किंतु ब्रह्मा जी संतुष्ट नहीं होते। वे महादेव का अपमान करने लगते हैं। शांतचित शिव यह अपमान सहन न कर सके और ब्रह्मा द्वारा अपमानित किए जाने पर उन्होंने रौद्र रूप धारण कर लिया। भगवान शंकर प्रलय के रूप में नजर आने लगे और उनका रौद्र रूप देखकर तीनों लोक भयभीत हो गए। भगवान शिव के इसी रूद्र रूप से भगवान भैरव प्रकट हुए। वह श्वान पर सवार थे, उनके हाथ में दंड था। हाथ में दंड होने के कारण वे ‘दंडाधिपति’ कहे गए। भैरव जी का रूप अत्यंत भयंकर था।  उन्होंने ब्रह्म देव के पांचवें सिर को काट दिया तब ब्रह्म देव को उनकी गलती का एहसास हुआ। तत्पश्चात ब्रह्म देव और विष्णु जी के बीच विवाद खत्म हुआ और उन्होंने ज्ञान को अर्जित किया जिससे उनका अभिमान और अहंकार नष्ट हो गया। मान्यता के अनुसार, भगवान काल भैरव का वाहन कुत्ता है इसलिए जब व्रती व्रत खोलें तो उसे अपने हाथ से कुछ पकवान बनाकर सबसे पहले कुत्ते को खिलाना चाहिए । ऐसा करने से भगवान काल भैरव की कृपा आती है।  पूरे मन से भगवान काल भैरव की पूजा करने पर भूत, पिचाश, प्रेत और जीवन में आने वाली सभी बाधाएं अपने आप ही दूर हो जाती हैं।

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