E books

ई-बुक्स पढ़ने का बढ़ता प्रचलन

आजकल आम जनजीवन की सभी चीज़ें डिजिटल होती जा रही हैं। इसी क्रम में अब किताबें भी डिजिटल या इलेक्ट्रॉनिक फॉर्म में उपलब्ध हैं। किताब पढ़ने के शौकिनों के लिए ये एक तरह की सुविधा भी है और चुनौती भी। अब किसी भी यात्रा के दौरान अलग से अपनी चहेती पुस्तक रखने की ज़रूरत नहीं होती, मोबाइल फोन या पैड के माध्यम से ही इसे पढ़ा जा सकता है। हालांकि ये ज़रूरी है कि ई-बुक पढ़ने के लिए उपलब्ध उपकरण भी होना चाहिए, जिस पर उस ई-बुक को सहजता के साथ पढ़ा जा सके। 

अगर उस उपकरण में बैट्री ना हो तो, पाठक पढ़ने से वंचित हो सकता है, लेकिन परंपरागत किताबों में सुविधा यह होती है कि उसे कहीं भी, किसी भी स्थिति में साथ रखा जा सकता है और पढ़ा जा सकता है। वहीं ई-बुक और परंपरागत छपी हुई किताबों के मूल्य में भी अंतर होता है। ई-बुक की कीमत, परंपरागत पुस्तकों से कम होती है। वहीं कागज़ पर छपी बुक पर पानी गिरने या उसके फटने, मुड़ने की आशंका बनी रहती है लिहाजा उसकी लाईफ बहुत अधिक नहीं हो सकती जबकि डिजिटल बुक के साथ ये समस्याएं नहीं होती है। 

इतना ही नहीं अब कई ई-बुक्स को मिलाकर एक ई-लाइब्रेरी की अवधारणा भी शुरू हो गई है, जिससे आसानी से अपने पसंद की किताब उस ई-लाइब्रेरी से लेकर पढ़ी जा सकती है, जबकि परंपरागत किताबी वाचनालय में काफी जगह की ज़रूरत होती है और उसमें आर्थिक दबाव भी बढ़ता है। डिजिटल लाइब्रेरी तक दुनिया के किसी भी हिस्से से पहुंचा जा सकता है।

ई-बुक्स के प्रचलित होने की एक वजह ये भी है कि ये पर्यावरण के लिए भी हितैषी हैं, जबकि परंपरागत पुस्तक को छापने के लिए इस्तेमाल होने वाले कागज़ के लिए पेड़ो की कटाई करनी होती है। हालांकि कई वर्षों से छपी हुई पुस्तकों को पढ़ने के आदि रहने वाले लोगों को परंपरागत अंदाज में पुस्तक पढ़ना ही भाता है। ई-बुक्स की तरफ झुकाव फिलहाल कई लोगों का नहीं है, इसलिए पुस्तक पब्लिशर भी अपने पाठकों को छपी हुई पुस्तक, ई-बुक और ऑडियो बुक्स तीनों का ही विकल्प देते हैं। पाठक भी अपने पसंदीदा लेखक के ऑटोग्राफ लेने के लिए छपी हुई पुस्तक ही खरीदना और सहेज कर रखना पसंद करते हैं। लिहाजा छपी हुई पुस्तक पढ़ने वाले पाठकों की संख्या फिलहाल ज्यादा ही है। आंखों की सेहत का ध्यान रखते हुए भी पाठक परंपरागत किताबों की ओर ही झुकते हैं। छपी हुई किताब एक मित्र की तरह होती है जो पाठक के पास रहती है और उसे छुआ जा सकता है, पाठक के लिए ये भावना ई-बुक में नहीं आ पाती है। 

वहीं दूसरी ओर ई-बुक को सहेजने में लगने वाली स्पेस काफी कम होती है। और सुविधानुसार उसके अक्षरों को भी बढ़ा या छोटा किया जा सकता है। साथ ही ई-बुक को अपने मित्र के साथ आसानी से साझा किया जा सकता है। जबकि छात्र जीवन और स्कूली जगत में छपी हुई पुस्तकों को ही तरजीह दी जाती है और एक छात्र का करीब 15 वर्षों का जीवन परंपरागत छपी हुई पुस्तकों के साथ ही गुजरता है, लिहाजा छपी हुई पुस्तक की आदत को बरकरार रखना एक आम पाठक के लिए आसान होता है। हालांकि पुस्तक चाहे इलेक्ट्रॉनिक फॉर्म में हो या छपे हुए रुप में, पुस्तक पढ़ना एक अच्छी आदत है जिसे बरकरार रखना चाहिए।
(साभार---चाइना मीडिया ग्रुप ,पेइचिंग)


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