Hukamnama sri harmandir sahib ji हुक्मनामा श्री हरिमंदिर

हुक्मनामा श्री हरिमंदिर साहिब जी 29 अगस्त

सूही महला ५ ॥  अम्रित बचन साध की बाणी ॥   जो जो जपै तिस की गति होवै हरि हरि नामु नित रसन बखानी ॥१॥ रहाउ ॥   कली काल के मिटे कलेसा ॥   एको नामु मन महि परवेसा ॥१॥   साधू धूरि मुखि मसतकि लाई ॥   नानक उधरे हरि गुर सरणाई ॥२॥३१॥३७॥  

गुरु की उच्चारी हुई बाणी आत्मिक जीवन देने वाले बचन हैं। जो जो मनुख (इस बाणी को) जपता है, उस की ऊँची आत्मिक अवस्था बन जाती है, वह मनुख हमेशां अपनी जिव्हा के साथ परमात्मा का नाम उच्चारता रहता है॥१॥रहाउ॥ (गुरबानी की बरकत से) क्लेशों-भरे जीवन-समय से सारे कलेश मिट जाते हैं, (क्यांकि बाणी का सदका) एक हरी नाम ही मन में टिका रहता है॥१॥ गुरु के चरने की धूल (जिन मनुखों ने अपने ) मुख और माथे पर लगा ली, हा नानक! वह मनुख गुरु की सरन आ के प्रभु के सरन आ कर (झगड़ों व् कलेशों से) बच गये ॥२॥

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