Hukamnama 27 August 2021 हुक्मनामा श्री हरिमंदिर साह

हुक्मनामा श्री हरिमंदिर साहिब जी 27 अगस्त

सोरठि महला ३ ॥   सो सिखु सखा बंधपु है भाई जि गुर के भाणे विचि आवै ॥  आपणै भाणै जो चलै भाई विछुड़ि चोटा खावै ॥  बिनु सतिगुर सुखु कदे न पावै भाई फिरि फिरि पछोतावै ॥१॥  हरि के दास सुहेले भाई ॥  जनम जनम के किलबिख दुख काटे आपे मेलि मिलाई ॥ रहाउ ॥  इहु कुट्मबु सभु जीअ के बंधन भाई भरमि भुला सैंसारा ॥  बिनु गुर बंधन टूटहि नाही गुरमुखि मोख दुआरा ॥  करम करहि गुर सबदु न पछाणहि मरि जनमहि वारो वारा ॥२॥  

हे भाई वो ही मनुख गुरु का सिख है , गुरु का मित्र है, गुरु का रिश्तेदार है, जो गुरु की रज़ा  में चलता है। परन्तु जो मनुख अपनी इच्छा अनुसार चलता है, वह  प्रभु से बिछुड़ कर दुःख सहारता है। गुरु की शरण आये बिने मनुख कभी सुख नहीं पा सकता, और बार बार (दुखी हो कर) पछताता है॥1॥ हे भाई! परमात्मा के भक्त सुखी जीवन व्यतीत करते है। परमात्मा खुद उनके जन्मों जन्मों के दुःख पाप काट देता है, और, उनको अपने चरणों में मिला लेता है॥रहाउ॥ हे भाई! (गुरु की रज़ा में चले बिना) यह अपना ) परिवार भी जीवन के लिए केवल मोह का बंधन बन जाता है, (तभी) जगत (गुरु से) भटक कर कुराहे पड़ा रहता है। गुरु की शरण आने के बिना यह बंधन टुटते नहीं। गुरु की शरण आने वाला  मनुख (मोह के बंधन से) खलासी पाने का रास्ता खोज लेता है। जो मनुख केवल दुनिया के काम-धंधे ही करते हैं, परन्तु गुरु के साथ साँझ नहीं बना पाते, वह  बार बार जन्म मरन में आते रहते है॥2॥

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