Hukamnama 21 May हुक्मनामा 21 मई

हुक्मनामा श्री हरिमंदिर साहिब जी 21 मई

सोरठि महला ९ ॥   प्रीतम जानि लेहु मन माही ॥   अपने सुख सिउ ही जगु फांधिओ को काहू को नाही ॥१॥ रहाउ ॥  सुख मै आनि बहुतु मिलि बैठत रहत चहू दिसि घेरै ॥   बिपति परी सभ ही संगु छाडित कोऊ न आवत नेरै ॥१॥ 

हे मित्र! (अपने) मन में यह बात पक्की तरह समझ ले, (कि) सारा संसार अपने सुख से ही बंधा हुआ है। कोई भी किसी का (अंत तक का साथी नहीं) बनता।१।रहाउ। हे सखा! (जब मनुख)! सुख में (होता है, तब) कई यार दोस्त मिल के (उसके पास)बैठते हैं, और, (उस को) चारों तरफ  से घेरें रखतें हैं। (परन्तु जब उस पर कोई) मुसीबत आती है, तब सारे ही साथ छोड़ जाते हैं, (फिर)कोई (उस के) पास नहीं आता।१।

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