Hukamnama

हुक्मनामा श्री हरिमंदिर साहिब जी 30 अक्टूबर

सूही छंत महला ४ ॥  मारेहिसु वे जन हउमै बिखिआ जिनि हरि प्रभ मिलण न दितीआ ॥  देह कंचन वे वंनीआ इनि हउमै मारि विगुतीआ ॥  मोहु माइआ वे सभ कालखा इनि मनमुखि मूड़ि सजुतीआ ॥  जन नानक गुरमुखि उबरे गुर सबदी हउमै छुटीआ ॥१॥  वसि आणिहु वे जन इसु मन कउ मनु बासे जिउ नित भउदिआ ॥  दुखि रैणि वे विहाणीआ नित आसा आस करेदिआ ॥  गुरु पाइआ वे संत जनो मनि आस पूरी हरि चउदिआ ॥  जन नानक प्रभ देहु मती छडि आसा नित सुखि सउदिआ ॥२॥ 

अर्थ :-हे भाई ! जिस हऊमै ने जिस माया ने (जीव को कभी) भगवान के साथ मिलने नहीं दिया, इस हऊमै को इस माया को (अपने अंदर से) मार ख़त्म करो । हे भाई ! (देखो !) यह शरीर सोने के रंग जैसा सुंदर होता है, (पर जहाँ हऊमै आ गई) इस हऊमै ने (उस शरीर को) मार के खुआर कर दिया ।  हे भाई ! माया का मोह केवल कालिख है, पर अपने मन के मुरीद इस मूर्ख मनुख ने (अपने आप को इस कालिख के साथ ही) जोड़ रखा है ।  हे दास नानक ! (बोल-हे भाई !) गुरु के मनमुख रहने वाले मनुख (इस हऊमै से) बच जाते हैं, गुरु के शब्द की बरकत के साथ उनको हऊमै से मुक्ति मिल जाती है ।1 ।  हे भाई ! (अपने) इस मन को (सदा अपने) वश में रखो । (मनुख का यह) मन सदा (शिकारी पंछी) बाशे जैसे भटकता है । सदा आशांए ही आशांए बनाते (मनुख की सारी जिंदगी की) रात दु:ख में ही बीतती है ।  हे संत जनो ! जिस मनुख को गुरु मिल गया (वह परमात्मा का नाम जपने लग जाता है, और) नाम अराधते हुए (उस के) मन में (उॅठी हरिनाम सुमिरन की) आशा पूरी हो जाती है । हे दास नानक ! (भगवान के दर पर अरदास करा कर और बोल-) हे भगवान ! (मुझे भी अपना नाम जपने की) सूझ बख्श (जो मनुख नाम जपता है, वह दुनिया वाली) आशांए छोड़ के आत्मिक आनंद में लीन रहता है ।2 । 

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