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हुक्मनामा श्री हरिमंदिर साहिब जी 27 नवंबर

सलोक मः ३ ॥  त्रिसना दाधी जलि मुई जलि जलि करे पुकार ॥  सतिगुर सीतल जे मिलै फिरि जलै न दूजी वार ॥  नानक विणु नावै निरभउ को नही जिचरु सबदि न करे वीचारु ॥१॥  मः ३ ॥  भेखी अगनि न बुझई चिंता है मन माहि ॥  वरमी मारी सापु ना मरै तिउ निगुरे करम कमाहि ॥  सतिगुरु दाता सेवीऐ सबदु वसै मनि आइ ॥  मनु तनु सीतलु सांति होइ त्रिसना अगनि बुझाइ ॥  सुखा सिरि सदा सुखु होइ जा विचहु आपु गवाइ ॥  गुरमुखि उदासी सो करे जि सचि रहै लिव लाइ ॥  चिंता मूलि न होवई हरि नामि रजा आघाइ ॥  नानक नाम बिना नह छूटीऐ हउमै पचहि पचाइ ॥२॥  पउड़ी ॥  जिनी हरि हरि नामु धिआइआ तिनी पाइअड़े सरब सुखा ॥  सभु जनमु तिना का सफलु है जिन हरि के नाम की मनि लागी भुखा ॥  जिनी गुर कै बचनि आराधिआ तिन विसरि गए सभि दुखा ॥  ते संत भले गुरसिख है जिन नाही चिंत पराई चुखा ॥  धनु धंनु तिना का गुरू है जिसु अंम्रित फल हरि लागे मुखा ॥६॥ 

पद अर्थ :-दाधी-साड़ी हुई । सीतलु-ठंड पाउण वाला । आपु-आपा-भावार्थ, अपनत्व, सुआरथ । आघाइ रजा-भली प्रकार तृप्त हुआ रहता है । पचहि-जलते हैं । चिंत-आशा । चुखा-रता भी । 
अर्थ :-दुनिया तृष्णा मे जली हुई दु:खी हो रही है, जल जल के पुकार रही है; अगर यह ठंडक पहुचाने वाले  वाले गुरु से मिल जाए, तो फिर दूसरी बार ना जले; (क्योंकि) हे नानक ! जब तक गुरु के शब्द के द्वारा मनुख भगवान की विचार ना करे तब तक (नाम नहीं मिलता, और) नाम के बिना किसी का भी भय नहीं खत्म होता (यह भय और सहम ही बार बार तृष्णा के अधीन करता है) ।1 ।  भेख बनाने से (तृष्णा की) अग्नि नहीं बुझती,मन में चिंता टिकी रहती है; जैसे साँप की रुड बंद करने से साँप नहीं मरता, उसी प्रकार वह मनुख कर्म करते हैं जो गुरु की शरण नहीं आते (गुरु की शरण पड़ के आपा-भाव मिटाए बिना तृष्णा की अग्नि बुझती नहीं है) । अगर (नाम की दाति) देने वाले गुरु की बताई हुई कार करें तो गुरु का शब्द मन में आ बसता है, मन तन ठंढा ठार हो जाता है, तृष्णा की अग्नि बुझ जाती है और मन में शांती पैदा हो जाती है; (गुरु की सेवा में) जब मनुख अहंकार दूर करता है तो सब से श्रेष्ठ सुख मिलता है । गुरु के सनमुख हुआ वह मनुख ही (तृष्णा की तरफ से) त्याग करता है जो सच्चे नाम में सुरति जोड़ी रखता है, उस को चिंता उॅका ही नहीं होती, भगवान के साथ ही वह भली प्रकार तृप्त हुआ रहता है ।  हे नानक ! भगवान का नाम सुमिरन के बिना (तृष्णा की अग्नि से) बच नहीं सकते, (नाम के बिना) जीव अहंकार में पड़े जलते हैं ।  जिन मनुष्यों ने भगवान का नाम सुमिरा है, उनको सारे सुख मिल गए हैं, उन का सारा मनुखा जीवन सफल हुआ है जिन के मन में भगवान के नाम की भूख लगी हुई है (भावार्थ, ‘नाम’ जिनकी जिंदगी का सहारा हो जाता है) । जिस जिस ने गुरु के शब्द के द्वारा भगवान का सुमिरन किया है, उन के सारे दुःख दूर हो गए हैं ।  वह गुरसिक्ख अच्छे संत हैं जिन्होंने ने (भगवान के बिना) ओर किसी की रता भी आशा नहीं रखी; उन का गुरु भी धन्य है,किस्मत वाला है, जिस के मुख को (भगवान की सिफ़त-सालाह रूप) अमर करने वाले फल लगे हुए हैं (भावार्थ, जिस के मुक्ख से भगवान की प्रशंसा के बचन निकलते हैं) ।6।

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