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हुक्मनामा श्री हरिमंदिर साहिब जी 06 दिसंबर

सोरठि महला ३ ॥   बिनु सतिगुर सेवे बहुता दुखु लागा जुग चारे भरमाई ॥   हम दीन तुम जुगु जुगु दाते सबदे देहि बुझाई ॥१॥    हरि जीउ क्रिपा करहु तुम पिआरे ॥   सतिगुरु दाता मेलि मिलावहु हरि नामु देवहु आधारे ॥ रहाउ ॥  

हे भाई! गुरु की सरन आये बिना मनुख को बहुत दुःख चिपका रहता है, मनुख सदा ही भटकता फिरता है। हे प्रभु! हम (जीव, तेरे दर के) भिखारी हैं, तूँ हमेशां ही दातें देने वाला है, (कृपा कर, गुरु के) शब्द में जोड़ कर आत्मिक जीवन की समझ बक्श॥१॥ प्यारे प्रभु जी! (मेरे ऊपर) कृपा कर, तेरे नाम की डाट देने वाला प्रभु मुझे मिला, और (मेरी जिन्दगी का) सहारा अपना नाम मुझे दे॥रहाउ॥





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