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हुक्मनामा श्री हरिमंदिर साहिब जी 01 दिसंबर

सोरठि महला ५ ॥  
खोजत खोजत खोजि बीचारिओ राम नामु ततु सारा ॥  किलबिख काटे निमख अराधिआ गुरमुखि पारि उतारा ॥१॥  हरि रसु पीवहु पुरख गिआनी ॥  सुणि सुणि महा त्रिपति मनु पावै साधू अम्रित बानी ॥ रहाउ ॥  मुकति भुगति जुगति सचु पाईऐ सरब सुखा का दाता ॥  अपुने दास कउ भगति दानु देवै पूरन पुरखु बिधाता ॥२॥ 

हे भाई! बहुत बड़ी खोज करके हम इस नतीजे पर पहुचे हैं कि परमात्मा का नाम (सुमिरन करना ही मनुख के जीवन की) सब से बड़ी असलियत है । गुरु की शरण आ कर ही हरी-नाम सुमिरन से(यह नाम) पलक झपकते ही (सारे) पाप काट देता है, और (संसार समुंदर) से पार कर देता है॥१॥ आत्मिक जीवन की समझ वाले मनुख! (सदा) परमात्मा का नाम रस पिया कर। (हे भाई!) गुरु की आत्मिक जीवन देने वाली बाणी के द्वारा (परमात्मा माँ) नाम बार बार सुन के (मनुख का) मन सब से ऊचा संतोष हासिल कर लेता है॥रहाउ॥ हे भाई! सरे सुखों का देने वाला, सदा कायम रहने वाला परमात्मा अगर मिल जाये तो यही है विकारों से खलासी (का मूल), यही है (आत्मा की) खुराक, यही है जीवन का सही ढंग। वह सर्ब-व्यापक सिरजनहार प्रभु भक्ति का (यह) दान अपने सेवक को (ही) बक्शीश करता है॥२॥

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