Hukamnama

हुक्मनामा श्री हरिमंदिर साहिब जी 25 सितंबर

वडहंसु महला ३ महला तीजा  ੴ सतिगुर प्रसादि ॥  प्रभु सचड़ा हरि सालाहीऐ कारजु सभु किछु करणै जोगु ॥ सा धन रंड न कबहू बैसई ना कदे होवै सोगु ॥ ना कदे होवै सोगु अनदिनु रस भोग सा धन महलि समाणी ॥ जिनि प्रिउ जाता करम बिधाता बोले अम्रित बाणी ॥ गुणवंतीआ गुण सारहि अपणे कंत समालहि ना कदे लगै विजोगो ॥  सचड़ा पिरु सालाहीऐ सभु किछु करणै जोगो ॥१॥ 

राग वडहंस में गुरु अमरदास जी की बानी। अकाल पुरख एक है और सतगुरु की कृपा द्वारा मिलता है। हे भाई! कायम रहने वाले हरी-प्रभु की सिफत सलाह करनी चाहिये, वेह सब कुछ करने में समर्थ है। हे भाई! जिस जिव इस्त्री ने सिरजनहार प्रीतम-प्रभु से गहरी साँझ जोड़ ली, जो उस प्रभु की आत्मिक जीवन देने वाली बनी उचारती है, उस जिव=इस्त्री की कबी नि-खस्मी नहीं होती, न ही उसे कोई चिंता सताती है, उस को कभी कोई गम  नहीं आता, वह हर समय परमात्मा का नाम-रस मानती है, और सदा प्रभु के चरणों में लीं रहती है। है भाई! गुणों वाली जिव-इस्त्री परमात्मा के गुण याद करती रहतीं है। प्रभु खसम को अपने हिरदय मैं बसी रखती हैं, उनको परमात्मा से कभी विचोदा नहीं होता। हे भाई! उस सदा-थिर रहने वाले प्रभु=पति की सिफत सलाह करनी चाहिए, वेह प्रभु सब कुछ करने की ताकत रखता है।१। 

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