Hukamnama 9 October हुक्मनामा श्री हरिमंदिर साहि

हुक्मनामा श्री हरिमंदिर साहिब जी 9 अक्टूबर

सूही कबीर जी ॥   थरहर क्मपै बाला जीउ ॥   ना जानउ किआ करसी पीउ ॥१॥   रैनि गई मत दिनु भी जाइ ॥   भवर गए बग बैठे आइ ॥१॥ रहाउ ॥   काचै करवै रहै न पानी ॥  हंसु चलिआ काइआ कुमलानी ॥२॥  कुआर कंनिआ जैसे करत सीगारा ॥  किउ रलीआ मानै बाझु भतारा ॥३॥  काग उडावत भुजा पिरानी ॥  कहि कबीर इह कथा सिरानी ॥४॥२॥

(इतनी उम्र भागती के बिना निकल जाने के कारण अब) मेरी अंजन जींद बहुत सहम गयी है की पता नहीं पति प्रभु (मेरे साथ) क्या सलूक करेगा।१। (मेरे) काले केश चले गए है, (उनकी जगह) सफ़ेद बाल आ गए हैं। (परमात्मा का नाम जपने के बिना ही मेरी) जवानी की उम्र निकल गयी है। (मुखे अब इस बात का डर है की) कही (इसी प्रकार) बुडापा भी न निकल जाये।१।रहाउ। (अब तक बे-परवाही में ध्यान ही नहीं किया कि यह सरीर तो कच्चे बर्तन की तरह है) कच्चे कछोरे में पानी टिका नहीं रह सकता। (श्वास बीतते गए, अब) सरीर मुरझा रहा है और (जीव-) भवर उडारी मरने को तयार है (परन्तु अपना कुछ भी नहीं संवारा)॥ जैसे कुंवारी लड़की सिंगार करती रहे, पति मिलने के बिना (इन सिंगरों का) उस को कोई आनंद नहीं आ सकता, (जैसे मैंने भी साडी उम्र कवल सरीर की कथीर ही आहर-पहर किया, प्रभु को विसरने के कारन कोई आत्मिक सुख नहीं मिला)॥३॥ कबीर कहता है कि (हे पति -प्रभु! अब तो आ मिल, तेरे इन्तजार में तो) काँव उड़ाते मेरी बाजू भी थक गयी है, (और उधर मेरी उम्र की) कहानी भी ख़तम होने को आ गयी है॥4॥2॥

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