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अमेरिका में कितने आश्चर्यजनक रहस्यों का खुलासा नहीं हुआ है?

अमेरिकी खुफिया एजेंसियों के द्वारा 90 दिनों के भीतर न्यू कोरोना वायरस की ट्रेस्बिलिटी पर निष्कर्ष पर निकाला जाने का स्वांग अस्थायी रूप से खत्म है,  और वे ​​किसी भी स्पष्ट निष्कर्ष के साथ आने में असमर्थ हैं। लेकिन इस प्रक्रिया में अमेरिका के कई रहस्य लगातार सामने आए हैं और विश्व जनमत का ध्यान आकर्षित है। लोग अक्सर अमेरिका में फोर्ट डेट्रिक प्रयोगशाला का उल्लेख करते हैं। लेकिन हाल ही में अमेरिका के ओल्ड वेस्टबरी में स्टेट यूनिवर्सिटी ऑफ़ न्यूयॉर्क के प्रोफेसर कार्ल ग्रॉसमैन द्वारा मीडिया को दी गई खबर ने व्यापक ध्यान आकर्षित किया है। ग्रॉसमैन के मुताबिक अमेरिका के प्लम द्वीप पर स्थित एक जैविक प्रयोगशाला "पशु रोग केंद्र" की जांच की जानी चाहिए, क्योंकि इस प्रयोगशाला में वैश्विक वायरस के निर्माण में प्रमुख संदेह है।
 
प्लम द्वीप अमेरिका के न्यूयार्क के पास लॉन्ग आइलैंड पर स्थित है।ग्रॉसमैन के अनुसार अमेरिका की फोर्ट डेट्रिक जैविक प्रयोगशाला ने एक बार नाजी जैविक हथियार विशेषज्ञों को प्लम द्वीप पर एक जैविक प्रयोगशाला स्थापित करने की मंजूरी दी थी, जिस पर लाइम वायरस के निर्माण का संदेह है। प्लम द्वीप बायोलॉजिकल लेबोरेटरी के निर्माता पूर्व नाजी जैविक युद्ध विशेषज्ञ एरिच ट्रब थे। प्रयोगशाला को मूल रूप से अमेरिकी सेना द्वारा नियंत्रित किया गया था और अब यह यूएस डिपार्टमेंट ऑफ होमलैंड सिक्योरिटी का हिस्सा है। 1993 में अमेरिका के "न्यूज़ डेली" द्वारा उजागर किए गए एक दस्तावेज़ के अनुसार, प्लम द्वीप बायोलॉजिकल लेबोरेटरी को सोवियत संघ पशुधन के खिलाफ जैविक हथियार विकसित करने का काम सौंपा गया था। इसके अलावा, प्लम द्वीप बायोलॉजिकल लेबोरेटरी को भी लाइम रोग की वैश्विक महामारी फैलने वाला स्रोत होने का संदेह था।
 
लंबे समय से अमेरिका को यह विश्वास रहा है कि जैव प्रौद्योगिकी एक ऐसा हथियार है जो दुश्मनी देशों के खिलाफ लक्षित करने के लिए उपयोगी है। इसी उद्देश्य में अमेरिका ने दुनिया भर में सैकड़ों जैविक अनुसंधान संस्थान स्थापित किए, और इन शोध संस्थानों का आंतरिक संचालन की जांच करना बिल्कुल मना है। न्यू कोरोना वायरस महामारी के फैलने के बाद अमेरिका ने अपनी महामारी-विरोधी क्षमताओं को मजबूत करने के बजाय "वुहान प्रयोगशाला रिसाव" जैसे झूठों की एक श्रृंखला बनाई। और चीन पर दोष मड़ने की पूरी कोशिश की। वायरस ट्रेस्बिलिटी एक गंभीर वैज्ञानिक मुद्दा है, और यह वैज्ञानिक समुदाय द्वारा निरंतर शोध के अधीन होना चाहिए। लेकिन अमेरिका ने डब्ल्यूएचओ विशेषज्ञों द्वारा पहुंचे स्पष्ट निष्कर्षों की अवहेलना की। इन वर्षों में अमेरिकी खुफिया एजेंसियों ने अन्य देशों में अपने सैन्य अभियानों के लिए आधार प्रदान करने के लिए अनगिनत धोखेबाज़ी, अफवाहें, हत्याएं और तोड़फोड़ की है। लेकिन इस सब को "अमेरिका के राष्ट्रीय हित" के बैनर तले लागू किया गया। हालांकि, किसी भी अमेरिकी खुफिया एजेंसी को कभी भी अमेरिकी जैविक प्रयोगशालाओं और अन्य गुप्त एजेंसियों के कार्यों की जांच करने के लिए अधिकृत नहीं किया गया है।
 
कोविड 19 महामारी की रोकथाम में अमेरिकी सरकार ने शुरू से ही लापरवाह नीति अपनाई, जिससे देश में महामारी फैलने से लाखों हजारों लोग संक्रमित हुए और छह लाख से अधिक लोगों ने अपनी जान गंवाई। हालाँकि, अमेरिकी राजनेताओं की प्रकृति आत्म-परीक्षा के बजाय सभी नुकसानों को दूसरों के सिर पर जिम्मेदार ठहराना है। लेकिन इस बार अमेरिकी खुफिया एजेंसी भी ट्रैसेबिलिटी के निष्कर्ष पर असमर्थ रही हैं। पर लोगों को फिर भी ये पूछना पड़ता है: न्यू कोरोना वायरस वास्तव में कहीं से आता है? यदि यह कृत्रिम प्रयोगशाला से आता है, तो अमेरिका डब्ल्यूएचओ विशेषज्ञों को अमेरिकी प्रयोगशाला में जांच करने के लिए आमंत्रित क्यों नहीं कर सकता? दूसरे देशों में निर्मित 200 से अधिक अमेरिकी जैविक प्रयोगशालाओं का उद्देश्य क्या है? अमेरिका में फोर्ट डेट्रिक और प्लम द्वीप की जैविक प्रयोगशालाओं की जांच की अनुमति क्यों नहीं है?
 
महामारी के मुद्दे पर चीन पर दोष मड़ने की कोशिश अमेरिका की चीन को दबाने के अपने दीर्घकालिक राजनीतिक इरादे से संबंधित है। लेकिन इस बार अमेरिकी ख़ुफ़िया एजेंसी भी ऐसे सबूत पेश नहीं कर सकती है जो चीन के प्रतिकूल है। इसके विपरित इसने विश्व का संदेह अमेरिका खुद की ओर खींचा है। वैज्ञानिक मुद्दे किसी भी राजनीतिक हेरफेर को बर्दाश्त नहीं कर सकते। नए कोरोना वायरस की ट्रेसबिलिटी के प्रति अंतर्राष्ट्रीय वैज्ञानिक समुदाय ने यह निष्कर्ष निकाला है कि चीनी प्रयोगशाला से रिसाव होना "बेहद असंभव" है। यदि अमेरिका को इस बात का सबूत मिलना चाहिए कि वायरस किसी प्रयोगशाला से आया है, तो लोगों को अमेरिका से अपनी प्रयोगशाला की खुली और पारदर्शी जांच करने के लिए कहने के कारण भी हैं।
(साभार-चाइना मीडिया ग्रुप, पेइचिंग)
 


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